#किस्साचाँदका
किस्सों,कहानियों,कविताओं,शायरियों एवं हिंदी फिल्मों में जो काल्पनिक चांद बेहद खूबसूरत एवं सुदूर माना जाता था,20 जुलाई 1969 को मानव ने उस पर अपना पहला कदम रख दिया।उस सुंदर और मनोहर चांद से मानव की पहली मुलाकात ने कई मिथक तोड़े।न वहां जीवन है और न ही होने की बहुत संभावनाएं।वह खूबसूरत चाँद मनुष्य की करतूतों से वाकिफ था शायद,उसने देखा होगा धरती पर हमारे विनाशकारी कारनामों को,वह सतर्क था कि हम खतरनाक लोगों के लिए वो धरती की तरह अपना सत्यानाश नहीं करायेगा।पिछले 50 सालों से चांद और आदमी के बीच एक गोरिल्ला युद्ध चल रहा है,आदमी वहां जीवन की संभावनाएं खोज रहा है और वह उन संभावनाओं को खत्म करने की कोशिश में लगा है।इसमें कौन जीतेगा यह तो नहीं कहा जा सकता परंतु इतना जरूर है कि मनुष्य एक ऐसा जीव है जो अपने बनाने वाले को भी चुनौती देकर उसे अपनी गलती का एहसास करा ही देता है तो चाँद उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है।40 के दशक में अमेरिका ने चाँद को रॉकेट से उड़ाने की योजना भी बनाई थी।
खैर,आज से 50 वर्ष पहले चंद्रमा पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति नील आर्मस्ट्रांग ने कहा था, "मानव का यह छोटा-सा कदम,मानवता के लिए बहुत ऊंची छलांग है।"16 जुलाई 1969 को अमेरिकी अंतरिक्ष यान अपोलो11,नासा के द्वारा,चाँद की ओर रवाना किया गया।इसमें तीन अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग,एडविन एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस थे।चंद्रयान 'ईगल' परिक्रमा यान 'कोलंबिया' से चांद की सतह पर पहुंचने से पहले अलग कर दिया गया।'ईगल' में नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन बैठे थे। 'कोलंबिया',जो कि चंद्रमा की सतह से 96 किलोमीटर दूर परिक्रमा कर रहा था,की जिम्मेदारी माइकल कॉलिंस को सौंपी गई थी।इस प्रकार 20 जुलाई 1969 को कल्पना के सुंदर चांद पर मानव ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।यह ऐतिहासिक उपलब्धि मानव सभ्यता के लिए बहुत बड़ी बात थी।अपोलो11अभियान में अब तक के सबसे बड़े और ताकतवर रॉकेट,सैटर्न-वी का इस्तेमाल हुआ था।अमेरिका ने 'अपोलो' मिशन 1960 से ही शुरू कर दिया था।अपोलो1से लेकरअपोलो10 तक के अभियान में चन्द्रमा से जुड़ी तमाम रोचक जानकारियों को इकट्ठा किया गया था।इसके बाद अपोलो 11,12,14,15,16 एवं 17 के द्वारा छः अंतरिक्ष यात्री चाँद तक पहुंचने में सफल हुए।अपोलो13 को तकनीकी खराबी आ जाने के चलते चन्द्रमा की सतह पर उतारा नहीं जा सका।20 अप्रैल 1972 का अपोलो17 अभियान चांद पर मानव भेजने का आखिरी अमेरिकी अभियान था।उसके बाद कोई भी मनुष्य चांद की सतह तक नहीं पहुंच सका है।इसके पीछे कई तर्क दिए जाते हैं- एक तो चंद्रमा पर मानव भेजने के अभियान में खर्च बहुत ज्यादा आता है,दूसरे इसका बहुत अधिक वैज्ञानिक लाभ भी नहीं है,तीसरा इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी सख्त जरूरत होती है।भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो,2022 तक चंद्रमा पर मानव भेजने की तैयारी में लगी हुई है।
चंद्रमा पर मानव भेजने में सफलता भले ही अमेरिका को मिली हो परंतु वहां अपने कई यान सोवियत संघ ने भी उसी दौरान भेजे।अमेरिका के अपोलो मिशन की तरह ही सोवियत संघ ने भी 'लूना' मिशन के तहत चंद्रयान भेजकर चंद्रमा के बारे में जानकारियां प्राप्त की।उसने 1959 में अपना पहला चंद्रयान लूना1 छोड़ा,फिर लूना 2,लूना3 चंद्रमा के अंधेरे भाग की तस्वीर निकालने वाला पहला चंद्रयान था।1966 में छोड़े गए,लूना9,अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर उतरकर दूरदर्शी के माध्यम से फोटो खींचे जो इतने करीब से चन्द्रमा की तस्वीरें लेने वाला पहला चंद्रयान था।1970 में भेजा गया,लूना16 चंद्रमा की मिट्टी के नमूने को धरती पर लाया।इस प्रकार सोवियत संघ ने लूना1 से लेकर लूना21 के तक के चंद्रयानों के माध्यम से चंद्रमा के बारे में अनेक जानकारियां प्राप्त की।जब अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग एवं एडविन एल्ड्रिन चाँद की सतह पर पहुँच कर इतिहास रच रहे थे,उसी समय सोवियत संघ का मानवरहित चंद्रयान लूना15, चन्द्रमा की सतह से 530 मील दूर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
22 अक्टूबर 2008 को भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी 'इसरो' ने अपने पहले ही प्रयास में मानवरहित अंतरिक्षयान चंद्रयान1 को चंद्रमा तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की।इसके साथ ही भारत अमेरिका,रूस,चीन और जापान के साथ चंद्रमा पर अंतरिक्षयान भेजने वालों की सूची में शामिल हो गया था।इसरो,इस अंतरिक्षयान को भेजने में खर्च एवं समय के मामले में सबसे अव्वल एजेंसी रही।चंद्रयान1में लगे अधिकतर उपकरण अमेरिकी स्पेस एजेंसी 'नासा' के थे।जिसके कारण चंद्रयान1 द्वारा जुटाए गए तमाम आंकड़ों को NASA से साझा करना पड़ा।जिनका अध्ययन एवं विश्लेषण करके श्रेय नासा ने ले लिया,जैसे-चंद्रमा पर पानी की पुष्टि भारतीय चंद्रयान1 ने की थी परंतु इसके आंकड़ों का विश्लेषण करके घोषणा करने का सौभाग्य नासा को मिल गया।आज,22 जुलाई 2019 को इसरो ने अपने दूसरे अंतरिक्षयान,चंद्रयान2 को चांद पर भेजा है।चंद्रयान2 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें उपयोग किए गए ज्यादातर उपकरण इसरो ने ही बनाए हैं।अतः इसके द्वारा दिए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने का मौका भी इसरो को ही मिलेगा।यह कदम भारत के 2022 तक चंद्रमा पर मानव भेजने के कार्यक्रम को एक नई दिशा प्रदान करेगा।
अब जबकि चंद्रमा के बारे में हमारे कई मिथक टूट चुके हैं।कवियों एवं शायरों के महबूब की तरह चाँद बहुत खूबसूरत तो नहीं है।लेकिन फिर भी चंद्रमा की अहमियत हम धरती पर रहने वाले प्राणियों के लिए आज भी बहुत है।क्योंकि अगर चंद्रमा न हो तो हमारे यहां दिन केवल 6 घंटे का ही होगा,चाँदनी रात का शीतल प्रकाश, ज्वार-भाटा का जिम्मेदार,चाँद आज भी शायरों का सबसे हसीन महबूब है।
'चलो मान लिया कि चाँद में दाग है,
मगर उसके होने से ही चाँदनी रात है!'
~अभिषेक सिंह
किस्सों,कहानियों,कविताओं,शायरियों एवं हिंदी फिल्मों में जो काल्पनिक चांद बेहद खूबसूरत एवं सुदूर माना जाता था,20 जुलाई 1969 को मानव ने उस पर अपना पहला कदम रख दिया।उस सुंदर और मनोहर चांद से मानव की पहली मुलाकात ने कई मिथक तोड़े।न वहां जीवन है और न ही होने की बहुत संभावनाएं।वह खूबसूरत चाँद मनुष्य की करतूतों से वाकिफ था शायद,उसने देखा होगा धरती पर हमारे विनाशकारी कारनामों को,वह सतर्क था कि हम खतरनाक लोगों के लिए वो धरती की तरह अपना सत्यानाश नहीं करायेगा।पिछले 50 सालों से चांद और आदमी के बीच एक गोरिल्ला युद्ध चल रहा है,आदमी वहां जीवन की संभावनाएं खोज रहा है और वह उन संभावनाओं को खत्म करने की कोशिश में लगा है।इसमें कौन जीतेगा यह तो नहीं कहा जा सकता परंतु इतना जरूर है कि मनुष्य एक ऐसा जीव है जो अपने बनाने वाले को भी चुनौती देकर उसे अपनी गलती का एहसास करा ही देता है तो चाँद उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है।40 के दशक में अमेरिका ने चाँद को रॉकेट से उड़ाने की योजना भी बनाई थी।
खैर,आज से 50 वर्ष पहले चंद्रमा पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति नील आर्मस्ट्रांग ने कहा था, "मानव का यह छोटा-सा कदम,मानवता के लिए बहुत ऊंची छलांग है।"16 जुलाई 1969 को अमेरिकी अंतरिक्ष यान अपोलो11,नासा के द्वारा,चाँद की ओर रवाना किया गया।इसमें तीन अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग,एडविन एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस थे।चंद्रयान 'ईगल' परिक्रमा यान 'कोलंबिया' से चांद की सतह पर पहुंचने से पहले अलग कर दिया गया।'ईगल' में नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन बैठे थे। 'कोलंबिया',जो कि चंद्रमा की सतह से 96 किलोमीटर दूर परिक्रमा कर रहा था,की जिम्मेदारी माइकल कॉलिंस को सौंपी गई थी।इस प्रकार 20 जुलाई 1969 को कल्पना के सुंदर चांद पर मानव ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।यह ऐतिहासिक उपलब्धि मानव सभ्यता के लिए बहुत बड़ी बात थी।अपोलो11अभियान में अब तक के सबसे बड़े और ताकतवर रॉकेट,सैटर्न-वी का इस्तेमाल हुआ था।अमेरिका ने 'अपोलो' मिशन 1960 से ही शुरू कर दिया था।अपोलो1से लेकरअपोलो10 तक के अभियान में चन्द्रमा से जुड़ी तमाम रोचक जानकारियों को इकट्ठा किया गया था।इसके बाद अपोलो 11,12,14,15,16 एवं 17 के द्वारा छः अंतरिक्ष यात्री चाँद तक पहुंचने में सफल हुए।अपोलो13 को तकनीकी खराबी आ जाने के चलते चन्द्रमा की सतह पर उतारा नहीं जा सका।20 अप्रैल 1972 का अपोलो17 अभियान चांद पर मानव भेजने का आखिरी अमेरिकी अभियान था।उसके बाद कोई भी मनुष्य चांद की सतह तक नहीं पहुंच सका है।इसके पीछे कई तर्क दिए जाते हैं- एक तो चंद्रमा पर मानव भेजने के अभियान में खर्च बहुत ज्यादा आता है,दूसरे इसका बहुत अधिक वैज्ञानिक लाभ भी नहीं है,तीसरा इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी सख्त जरूरत होती है।भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो,2022 तक चंद्रमा पर मानव भेजने की तैयारी में लगी हुई है।
चंद्रमा पर मानव भेजने में सफलता भले ही अमेरिका को मिली हो परंतु वहां अपने कई यान सोवियत संघ ने भी उसी दौरान भेजे।अमेरिका के अपोलो मिशन की तरह ही सोवियत संघ ने भी 'लूना' मिशन के तहत चंद्रयान भेजकर चंद्रमा के बारे में जानकारियां प्राप्त की।उसने 1959 में अपना पहला चंद्रयान लूना1 छोड़ा,फिर लूना 2,लूना3 चंद्रमा के अंधेरे भाग की तस्वीर निकालने वाला पहला चंद्रयान था।1966 में छोड़े गए,लूना9,अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर उतरकर दूरदर्शी के माध्यम से फोटो खींचे जो इतने करीब से चन्द्रमा की तस्वीरें लेने वाला पहला चंद्रयान था।1970 में भेजा गया,लूना16 चंद्रमा की मिट्टी के नमूने को धरती पर लाया।इस प्रकार सोवियत संघ ने लूना1 से लेकर लूना21 के तक के चंद्रयानों के माध्यम से चंद्रमा के बारे में अनेक जानकारियां प्राप्त की।जब अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग एवं एडविन एल्ड्रिन चाँद की सतह पर पहुँच कर इतिहास रच रहे थे,उसी समय सोवियत संघ का मानवरहित चंद्रयान लूना15, चन्द्रमा की सतह से 530 मील दूर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
22 अक्टूबर 2008 को भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी 'इसरो' ने अपने पहले ही प्रयास में मानवरहित अंतरिक्षयान चंद्रयान1 को चंद्रमा तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की।इसके साथ ही भारत अमेरिका,रूस,चीन और जापान के साथ चंद्रमा पर अंतरिक्षयान भेजने वालों की सूची में शामिल हो गया था।इसरो,इस अंतरिक्षयान को भेजने में खर्च एवं समय के मामले में सबसे अव्वल एजेंसी रही।चंद्रयान1में लगे अधिकतर उपकरण अमेरिकी स्पेस एजेंसी 'नासा' के थे।जिसके कारण चंद्रयान1 द्वारा जुटाए गए तमाम आंकड़ों को NASA से साझा करना पड़ा।जिनका अध्ययन एवं विश्लेषण करके श्रेय नासा ने ले लिया,जैसे-चंद्रमा पर पानी की पुष्टि भारतीय चंद्रयान1 ने की थी परंतु इसके आंकड़ों का विश्लेषण करके घोषणा करने का सौभाग्य नासा को मिल गया।आज,22 जुलाई 2019 को इसरो ने अपने दूसरे अंतरिक्षयान,चंद्रयान2 को चांद पर भेजा है।चंद्रयान2 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें उपयोग किए गए ज्यादातर उपकरण इसरो ने ही बनाए हैं।अतः इसके द्वारा दिए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने का मौका भी इसरो को ही मिलेगा।यह कदम भारत के 2022 तक चंद्रमा पर मानव भेजने के कार्यक्रम को एक नई दिशा प्रदान करेगा।
अब जबकि चंद्रमा के बारे में हमारे कई मिथक टूट चुके हैं।कवियों एवं शायरों के महबूब की तरह चाँद बहुत खूबसूरत तो नहीं है।लेकिन फिर भी चंद्रमा की अहमियत हम धरती पर रहने वाले प्राणियों के लिए आज भी बहुत है।क्योंकि अगर चंद्रमा न हो तो हमारे यहां दिन केवल 6 घंटे का ही होगा,चाँदनी रात का शीतल प्रकाश, ज्वार-भाटा का जिम्मेदार,चाँद आज भी शायरों का सबसे हसीन महबूब है।
'चलो मान लिया कि चाँद में दाग है,
मगर उसके होने से ही चाँदनी रात है!'
~अभिषेक सिंह

