Tuesday, 28 April 2020

प्रयागराज से अपने घरों को निकलते छात्र

ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता,
अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है..!!
~अख़्तर सईद ख़ान


Friday, 24 April 2020

प्रयागराज में कोरोना के तीन नये मामले मिले

प्रयागराज जिले में तीन नए कोरोना संक्रमित युवक मिले हैं। शुक्रवार दोपहर जांच  रिपोर्ट आई तो हड़कंप मचा गया। तीनों संक्रमितों को अब कोविड 19 के लिए बने एल वन अस्पताल कोटवा सीएचसी में भर्ती किया जाएगा। अब कुल संक्रमितों की संख्या चार हो गई है। हालांकि इनमें पहला संक्रमित युवक ठीक हो गया है।
तीनों संक्रमितों में दो युवक शंकरगढ़ इलाके के  रहने वाले हैं। 21 अप्रैल को मुंबई से लौटकर आए थे। सर्वे टीम ने उन्हें क्वारंटीन स्थल कालिंदीपुरम स्थित अपार्टमेंट में रखा था। इसके अलावा एक युवक शिवकुटी इलाके का रहने वाला है। हाल ही में वह ई पास बनवाकर बनारस गया था। वहीं किसी संक्रमित युवक के संपर्क में आया था। जब वहां का युवक कोरोना पॉजिटिव पाया गया तो इसकी भी खोज शुरू हुई। मिलने पर नमूना लेकर जांच कराया गया तो रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। शंकरगढ़ व शिवकुटी इलाके को हाट स्पाट घोषित कर दिया गया है।

आभासी दुनिया में भावशून्य होता हमारा समाज

"भाई साहेब हम इंसान इतने भावशून्य क्यों होते जा रहे हैं?"
  एक मित्र ने जब ये सवाल किया तो मेरे मन में हजारों विचार पनपने लगें। मैं सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ हमारे साथ जो हम इतने निष्ठुर होते जा रहे हैं। बड़ी से बड़ी घटना, दुर्घटना, पीड़ा को नज़रअंदाज़ करके जीना कैसे सीख लिया हमने। उसका उत्तर मेरी समझ से बाहर था। इसलिए मैंने तुरंत जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन ये प्रश्न मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है। गाहे बगाहे दिमाग़ में गूँजता रह रहा है। फिर मैंने बारीकी से सोचने की कोशिश की। कुछ चीजें समझ में आयी। इसके लिए मैंने कोई शोध अथवा खोजबीन नहीं की। बस मुझको जो महसूस हुआ, वही आपसे साझा कर रहा हूँ।
   पहले संयुक्त परिवार हुआ करता था। महंगाई इतनी ज्यादा नहीं थी या यों कहें जरूरतें सीमित थीं। सर ढ़कने के लिए एक मिट्टी का घर, पेट भरने के लिए जो जून की रोटी, पहनने के लिए दो जोड़ी कपड़े। संसाधनों का आविष्कार इतनी मात्रा में नहीं था और उसकी पहुँच इतनी सुलभ भी नहीं थी;दूसरे हमारी महत्वाकांक्षा भी इतनी प्रबल नहीं थी। लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय था। परिवार के लोग एकसाथ खेत में काम करते, एकसाथ भोजन करते और एकसाथ आराम करते। पहले घर बहुत बड़े भी नहीं होते थे, सब के अपने अलग कमरे नहीं होतें थे, लोग एकदूसरे के बगल चारपाई डाल के सोते थे। जब लोग इतने करीब होंगे तो ज़ाहिर सी बात है कि एकदूसरे के सुखदुख से वाकिफ भी होंगे और शामिल भी होंगे। शाम को गाँव में बैठकी हुआ करती थी। सबके हालचाल, हँसी मज़ाक़ और रहन सहन से हर कोई वाकिफ़ हुआ करता था। ऐसे में लोगों की संवेदना एकदूसरे से जुड़ी हुई थी। शादी विवाह, जन्म मरण, हँसी खुशी के समारोह गाँव के हर सदस्य की भागीदारी हुआ  करती थी। किसी के घर से चारपाई, कहीं से बिस्तर, कहीं से राशन, सब साथ मिलकर व्यवस्था करते और साथ मिलकर ही जश्न भी मनाते। ऐसे में हर आदमी दूसरे आदमी से जुड़ा हुआ महसूस करता और उसके दुख दर्द में पीड़ा भी महसूस करता। अब परिवार टूट गये। संसाधन बढ़ गए, मंहगाई बढ़ गई, जरूरत बढ़ गई और महत्वाकांक्षा तो आसमान छूने लगी। लोग एकदूसरे से दूर होने लगे। पलायन होने लगा। शिक्षा, रोजगार और सुख की तलाश में सब अलग अलग भटकने लगे। और जब दूरी बढ़ती तो स्वाभाविक सी बात है संवेदना घट जाती है।अब दुर्घटना होती है तो ये किसी के लिए समाचार का स्रोत है, किसी के शोध का विषय है, किसी के एजेंडे में फिट करने लायक है, किसी के मनोरंजन है।जब हम खुद को उससे जुड़े हुए महसूस ही नहीं कर पाते तो उसके लिए भाव कैसे रख सकते हैं। वैसे एक सत्य यह भी है कि घृणित आदमी बुरी ख़बर का इंतज़ार करता है, वही उसके असतित्व का साधन है।
  रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल और कम्प्यूटर का आविष्कार हुआ। सबकुछ बहुत आसान हो गया। पहले रिश्तेदारों का हालचाल लेने लोग तीन तीन दिन पैदल चलकर जाते थे। जिसके यहाँ जाते थे वो पूरा घर सर पर उठा लेता था। आवभगत सीमित साधनों में पूरे भाव से किया जाता था। मेहमान और मेज़बान दोनों आभारी हो जाते थे। विदा करते समय दोनों के आँखों में आँसू भी होता था। इसके दो कारण थे एक तो पता नहीं कब अगली मुलाकात हो और दूसरा कि अगली बार मुलाकात हो कि न हो।आज के दौर में कहीं पहुँचना आसान हो चुका है। सड़कें बन गईं हैं, गाड़ियों की कमी नहीं है लेकिन अब कोई जल्दी किसी के यहाँ जाता नहीं।अब अपने घर किसी को बुलाने के लिए या तो मरना पड़ता है या फिर शादी करनी पड़ती है। क्योंकि हालचाल, सुखदुख और बातचीत सब मोबाइल, कम्प्यूटर के माध्यम से हो ही जाती है। मतलब पहले हम फिज़िकली कनेक्टेड थे, अब वर्चुअली। जब हम आमने सामने होतें हैं तो नौटंकी नहीं कर पाते, हमारे भाव असली होतें हैं और अगर नकली हुए भी तो सामने वाले की समझ में आ जातें हैं। लेकिन फोन पर नकली हँसना, रोना, झूठ बोलकर मूर्ख बनाना सब संभव है। आभासी दुनिया में मरने का विडियो देखकर आभासी पीड़ा, दुर्घटना देखकर आभासी दुख...सबकुछ झूठ और नकली। पहले तो कुछ फर्क भी पड़ता था लेकिन आए दिन वही चीज देखते देखते आदत पड़ गई है। किसी ने किसी को मार दिया, कहीं भीड़ हत्या हो गई, कहीं बालात्कार हो गया, कहीं प्राकृतिक आपदा आ गई। सबके फोटो और विडियो न्यूज़ चैनल से लेकर सोशलमीडिया तक फैलने लगते हैं। विडियो देखे, कमेंट की किए, भगवान उनकी आत्मा को शांति दें वाला पोस्ट किये, लम्बा लेख पढ़े, कुछ जुड़ने की कोशिश कर ही रहे थे कि महिला पुरुष, दलित, हिन्दू मुस्लिम वाला फैक्टर निकल कर आ गया। अब क्या?जहाँ दुख होना चाहिए था वहाँ घृणा, आरोप प्रत्यारोप और दंगा फसाद होने लगा। पूरा मुद्दा मुड़कर कहीं और चला गया। और हम धीरे धीरे खतरनाक होते गए। बिना भाव के, बिना पीड़ा के एकदम हिंसक पशुओं की तरह। हमारे समाज में रोने को मूर्खता समझा जाने लगा है, सीधा  होने का मतलब बुद्धिहीन। बुद्धि के प्रकोप ने हँसने को,मारने को लड़ने को तो प्रासंगिक रहने दिया लेकिन रोने को, बचाने को और बर्दाश्त करने को कायरता की श्रेणी में डाल दिया।



~अभिषेक सिंह

Wednesday, 15 April 2020

वैश्विक महामारी में काम आयेगी एक सच्ची मुस्कान

मुस्कान में जबरदस्त शक्ति होती है।जिसे मुस्कराने का हुनर मालूम है, उसके आसपास के लोग अच्छा महसूस करते हैं। कई बार हमारे बीच फैली उदासी, मायूसी, गुस्सा और अकेलेपन को बस एक सच्ची मुस्कान की दरकार होती है। चित्रों में हम देखते हैं कि देवता हमेशा मुस्कराते और शांत नज़र आते हैं। राक्षस गुस्से में, बेचैनी में और असंतुष्ट नज़र आते हैं। राम के चरित्र को और भी प्रभावशाली बनाती है, उनके चेहरे पर फैली वो मुस्कान। वो मुस्कान उनके साथ लड़ने वालों को हौसला देती है, घबराने से रोकती है और दुश्मन के लिए ख़ौफ़ पैदा करती है।
 आज हम सभी घरों में बंद हैं, बेबस हैं। अपनी इच्छाओं पर लगाम लगा रहे हैं। कुछ लोग अपने घर से दूर हैं, किसी की नौकरी खतरे में है, एक अनदेखा दुश्मन हमें चारो खाने चित्त कर दिया है। हमें नहीं पता क्या होगा, कब होगा, सबकुछ पहले जैसा होगा या नहीं, आगे सब बेहतर होगा  या फिर बदतर। कई सवालों के जबाब नहीं मिल रहें हैं, पूरी मानवजाति अनिश्चितता में जी रही है। ऐसे में हमें सीखना होगा मुस्कराना। हमें अपने लोगों को यकीन दिलाना होगा कि अभी आशा है, उम्मीद कायम है। मेरी तरह निपट अकेले हैं और घबरा रहे हैं तो खुद को आइने सामने मुस्कराते हुए देखिए। झूठी नहीं, सच्ची मुस्कान। ये काम करता है। फ़िलहाल मैंने तो इसे आजमाया है। पिछले एक महीने से एकदम अकेले एक कमरे में बंद होकर जीने के लिए मैंने यही रास्ता चुना है। सोशलमीडिया पर लोगों की एक्टिविटी देखकर निराश मत होईये। अन्य महापुरुषों की तरह क्रिएटिव नहीं हैं तो भी कोई बात नहीं। फेसबुक पर डालने लायक खाना नहीं बना रहे हैं, मीम्स में हाथ तंग है, ढ़ाई बीघे की पोस्ट लिखकर ज्ञान नहीं बघारा जा रहा है, कोरोना, कोरेंटाइन, आइसोलेशन पर कविता, कहानी नहीं लिख पा रहे हैं, महान लेखकों की अद्वितीय किताबों में मन नहीं लग रहा है, नेटफ्लिक्स पर फिल्म नहीं देखा जा रहा है, कोई बात नहीं। ख़ुद को माफ़ कर दीजिए। आपसे जो हो पा रहा है, वही करिये। कोई जबरदस्ती नहीं, कोई दबाव नहीं। समाज के हिसाब से ज़िन्दगी जीते ही आयें हैं, आगे भी जीना ही पड़ेगा। लेकिन ये वक़्त सिर्फ आपका है। जो कुछ भी मन का लगे, वही करिये।शांत रहिये और हमेशा मुस्कराते रहिये।जैसा कि नक्श लायकपुरी का एक शेर है-
"ज़िन्दगी  में  सदा  मुस्कराते  रहो,
 फासले कम करो दिल मिलाते रहो।"

Thursday, 9 April 2020

लॉकडाउन और गरीबी

नेटफ्लिक्स पर एक फिल्म है "The Platform".एक स्टेशन है..हर फ्लोर पर दो आदमी..कब किसका फ्लोर बदल जाये कुछ पता नहीं।स्टेशन पर सबके खाने का इंतज़ाम किया जाता है। लेकिन दिक्कत ये है कि खाना सारे फ्लोर से होकर गुजरता है। लोग अपनी आवश्यकता से ज्यादा खाते और बर्बाद करते हैं। जिसकी वजह से बहुत सारे फ्लोर पर खाना पहुँच ही नहीं पाता। वो भूखे रहते हैं। भूख से तड़पते हैं। अब दो भूखे लोगों में जो ज्यादा ताकतवर होता है वो दूसरे को मार देता है। उस आदमी के मांस से अपने पेट की आग बुझाता है। एकतरफ ये अमानवीय नज़ारा होता है जो हैरान कर देता है दूसरी तरफ ये कि जिन लोगों तक पर्याप्त भोजन पहुँच रहा होता है अगर वो लोग केवल अपने हिस्से का खाते तो स्टेशन पर किसी को भूखा नहीं रहना पड़ता।
  अब बात करते हैं आज के परिपेक्ष्य में..एक तरफ वो लोग हैं जो सम्पन्न हैं, जिनकी पहुँच है, जिनके लिए कुछ भी सम्भव है। दूसरी तरफ वो लोग जो उपेक्षित, नंगे, भूखे, गरीब हैं। सक्षम लोगों का घर भरा पड़ा है, वो खुद खा रहे हैं, गरीबों को खिला रहे हैं, फोटो खिंचा रहे हैं। उनके लिए सबकुछ ठीक चल रहा है। वंचित लोग पैसे की कमी से जूझ रहे हैं, जो जून की रोटी के लिए तिकड़म कर रहे हैं। गलती कर रहे हैं, गालियाँ सुन रहे हैं। बच्चों का पेट भर जाये इसलिए बाप भूखा सो रहा है, गली के कुत्ते भूखे मर रहे हैं। ये स्थिति ज्यादा दिन तक रही तो ये भी नौबत आ सकती है कि कोई किसी को मारकर अपना पेट भरे। वह समाज की नज़र में दानव होगा, दुनिया कोसेगी उसे। लेकिन आज तमाम चीजों से अपना घर भरते वक़्त क्या आपको तनिक भी ख़्याल आ रहा होगा कि कोई खाली हाथ लौट गया होगा दुकान से, कीमत बढ़ रही है, सबके बस की बात नहीं है कि वो खरीद सके अपनी जरूरत भर की ही वस्तुएँ..!! मनुष्य का स्वभाव है संहार...नकाबों में ये स्वभाव छिप जाता है मगर नकाब उतरा तो कई लोग उतर जायेंगे बहुत नीचे फिर देते रहियेगा दुहाई मानवता की..!!

Friday, 3 April 2020

Modi's video Message to People


  • Today, Prime minister Narendra Modi issued a video message.He said that we should be United as a nation in the fight against coronavirus pandemic. Prime minister said, "On April 5, I urge all of you to stand on your doorway or balconies and for nine minutes light a candle, diya, torch or your mobiles with an aim to fight the darkness spread by coronavirus with light.If everyone lights one diya each,then we will realise the power of that light. We will be able to highlight the objective for which we all are fighting together.I have one request. During this event, no one is supposed to gather. No one should assemble on roads or their colonies. This task needs to be completed from balconies and doorways of your homes.The country-wide lockdown completed nine days today. During this time, the way you people have set an example of discipline and service was unprecedented.Do not cross Lakshman Rekha of social distancing. Social distancing is not to be broken under any circumstances. This is the panacea for breaking the corona chain.The way all of you on March 22 thanked everyone fighting against coronavirus was appreciated across the world. Countries around the world are adopting the concept.When millions of people are enclosed inside their homes, there must be some who must be asking how can they alone fight this battle against Covid-19.We are not alone. This is the power of 130 crore people.This awareness gives us motivation, gives us a goal and gives us the energy to achieve them, it further clears our path.Fiends, amidst this darkness caused by coronavirus epidemic, we need to constantly pursue to reach towards the light."