Wednesday, 25 November 2020

मशहूर खिलाड़ी माराडोना का 60 की उम्र में निधन

 अर्जेंटीना के महान फुटबॉल खिलाड़ी डिएगो माराडोना का कार्डियक अरेस्ट के कारण आज निधन हो गया। कुछ दिनों पहले दिमाग़ में क्लाटिंग के लिए उनका ऑपरेशन हुआ था।1986 में अर्जेंटीना को अपनी कप्तानी में फुटबॉल चैंपियन बनाने वाले माराडोना विश्व के महानतम फुटबॉल खिलाड़ियों में से एक थे। 1982 के फुटबॉल विश्व कप में मात्र 21 साल के माराडोना ने सुर्खियां बटोरकर सबका ध्यान आकर्षित किया। थोड़े ही दिनों में वो अपने देश के लिए स्टार खिलाड़ी और दुनिया के मशहूर फुटबॉल क्लबों के लिए प्रमुख खिलाड़ी बन गए। माराडोना बर्सिलोना और नेपाली के लिए भी खेले। उन्होंने अपने के लिए 91 मैचों में 34 गोल दागे और चार बार विश्व कप में अपनी टीम के अगुआ रहे। 1991 में ड्रग्स लेने के लिए उन्हें 15 महीने का प्रतिबंध भी झेलना पड़ा। 1997 में 37 साल के माराडोना ने अपने यादगार फुटबॉल कैरियर को अलविदा कह दिया। 

Monday, 23 November 2020

हमारा मौलिक स्वभाव

 हम असंतुष्ट,अतृप्त,अनियंत्रित प्रजाति से हैं।हमें शांति, सौहार्द, प्रेम समझ में ही नहीं आता।हलांकि हममें से ज्यादातर लोग लगातार इन्हीं विषयों में घिरे रहते हैं।पहले हम जंगली थे।अलग थलग रहते थे।जंगल के ताकतवर जानवरों से भागते-फिरते, आपस में लड़ते-भिड़ते।फिर हमें साथ रहने की आवश्यकता महसूस हुई।परिवार बना, समाज बना, नियम-कानून बनें, धर्म बना।आग मिली, विज्ञान मिला, ताकत मिली, बुद्धि मिली।फिर लालच का जन्म हुआ। आपस में कटने-मरने लगे,सत्ता के लिए, शक्ति के लिए, जमीन के लिए, जोरू के लिए। तमाम शहर, घर, देश को उजाड़ने के बाद ऊब गए। तमाम संगठन बनाये... शांति, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए। पूरी दुनिया को एकसाथ एकजुट रहने के लिए प्रेरित करने लगे। हमने नदियाँ सुखाई, जंगल काटे, पहाड़ो को तोड़ा फिर इन्हीं को जोड़कर घर बनाया। ये भी नहीं जमा तो घर भी तोड़ दिए, समाज तोड़ दिए और अकेले रहने में ज्यादा स्वतंत्रता और सुख मिलने लगा। अकेले रहते रहते अवसाद से घिर गए फिर सोशल होने की कोशिश कर रहे हैं। ये भी नहीं जम रहा तो तमाम प्रकार के धार्मिक, जातीय और लैंगिक झगड़े पैदा कर लिए। अभी तक ये सब कूल लग रहा है, कुछ दिन में इससे भी ऊब जायेंगे। कयामत कहीं और से नहीं आयेगी। एकदिन हम ही बौरा जायेंगे और जला डालेंगे सारी दुनिया।

सनसनीखेज खबरों का व्यापार

 ये न्यूज़ एंकर्स जिस घटियापन से रिपोर्टिंग कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि वेब और प्रिंट मीडिया के लिए सुनहरा अवसर आने वाला है। टेलीविजन वालों के शोज़ अब केवल मीम्स बनाने के लिए ही लोग देखते हैं। अखबारों को अब 'समोसे के तेल सुखाने' वाली इमेज से बाहर आना चाहिए। लोग उनकी तरफ उम्मीद लगा कर बैठे हैं। खबरों का स्तर इसलिए भी गिरता जा रहा है क्योंकि उनके लिए हम अपनी जेब नहीं हल्की करना चाहते। फ्री में न्यूज़ पाने की लालसा रखियेगा तो वही मिलेगा जो कोई पैसे देकर आप तक पहुँचायेगा। फिर आपको शिकायत होती कि अरे भई सही सूचना तो मिल ही नहीं रही है। सब फेक़, प्रोपेगेंडा और एजेण्डा चला रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस फील्ड को भी नेताओं, बाहुबलियों और बिज़नेस मैन ने कैप्चर कर लिया है। न कुछ खुल कर लिख सकते हैं, न बोल सकते हैं और न ही छाप सकते हैं। और जिन्होंने इसके ख़िलाफ़ जाने की कोशिश की, वो या तो नौकरी से हाथ धो बैठता है या फिर जान से। इधर हिंदी की दो पत्रिकाएँ बंद होने की खबर है, लोग फेसबुक पर रो रहे हैं। ये वही लोग हैं जो हिंदी बोलने, पढ़ने में भी लजाते हैं। अगर पर्याप्त पाठक मिलते तो कोई क्यों ही भला बंद करता। बाकी रात बहुत हो गई है...अपने पसंद का कोई कार्टून न्यूज़ सुनकर सो जाइए...!!

शराब की संस्कृति

 पियक्कड़, शराबी से एक पायदान ऊपर होतें हैं।गाँव में पियक्कड़ों का बोलबाला चलता है।शाम को नहाये-धोये, सायकल निकाले, गेहूँ लादा और निकल पड़े मयखाने की ओर।चौराहे पे गये तो संगत मिली,चंदा लगा और आ गई दो-चार शीशी। जैसे-जैसे चढ़ना शुरू होता, वैसे-वैसे लहजा बदलता जाता है।गाली-गलौज, मारपीट करके आधा नशा उतरवाकर किसी तरह घर पहुँचते हैं।मेहरारू देखते ही बड़बड़ाने लगती है।पियक्कड़ को आत्मग्लानि हो जाती है, उसी ग्लानि में बीबी, बच्चों को पीट कर खाने की थाली फेंककर गरियाता हुआ गाँव में निकल जाता है। बीबी पीछे-पीछे पहुँचती है। पियक्कड़ को अब और आत्मग्लानि होती है तो जो सामने मिलता उसी गरियाने लगता है।चूँकि गाँव की तरफ पियक्कड़ बहुत ज्यादा हैं इसलिए गाँव वाले उनसे सहानुभूति भी रखते हैं। चाहे जितना गरिया ले लेकिन चूँ नहीं करते हैं। अगर किसी ने पलटकर जवाब दे दिया तो सुबह पंचायत में फटकारा जाता है कि भई उसने तो पी रखी थी, तुम तो होश में थे..तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।इसलिए गाँव में जो होश में है उसे गरियाने का अधिकार प्राप्त है.. एक पियक्कड़ को। अब मुसीबत तब आती है जब पियक्कड़ से दूसरा पियक्कड़ टकरा जाता है। शेर के आगे शेर, दारू की इज़्ज़त का सवाल है तो पीछे हटने का कोई कारण ही नहीं है। दोनों भिड़ गए, दोनों की बीबियाँ घर की ओर भागीं। दोनों खानदान आमने-सामने।दोनों सेनाएँ हुंकार भरने लगती हैं। अब यहाँ से शुरू होता है असली मनोरंजन पूरे दो-तीन घंटे का एक शो। पूरा गाँव घेर कर तमाशा देखता है। किसी तरह दोनों पियक्कड़ थककर गले मिलते हैं और घर लौट आते हैं।घर का सबसे बड़ा लड़का ये सब देखता है और अपने बाप से भिड़ जाता है, बाप उसको बल भर कूट देता। महतारी रोते हुए हल्दी प्याज बाँधती है। पियक्कड़ को सुबह अपनी गलती का अहसास होता है लेकिन शाम तक बेचारा फिर बेबस होकर ठेके तरफ निकल पड़ता है। वहाँ देखता है कि बेटा पहले से ही लाइन लगाकर खड़ा है...कुछ बोलना चाहता ही है कि उसे बेटे की आँखों में अपने से भी ज्यादा ग्लानि नज़र आती है। उसी दिन बाप की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। अब बेटा रोज़ पीकर आता है और आत्मग्लानि में बाप को दस बीस गालियाँ, दो चार थप्पड़ रसीद कर देता है। यही चक्र चलता रहता है।

शौचालय सिर्फ सोच नहीं,संस्कृति भी बननी चाहिए

 सरकार भले ही देश को 'खुले में शौच' से मुक्त कर चुकी हो लेकिन गाँवों में आज भी बड़ी संख्या में लोगों की पहली पसंद खेत-खलिहान ही है।ऐसा भी नहीं है कि शौचालय के लिए पैसा नहीं आया है गाँवों में। खूब पैसा आया है और ज्यादातर के खातों में पहुँच भी चुका है। लेकिन वह धनराशि केवल बारह हज़ार है। अब इतने पैसों में अच्छा शौचालय तो बन नहीं सकता है। यानि की शौचालय बनाने के लिए आदमी को अपनी जेब से भी कुछ पैसा लगाना पड़ेगा। अब गाँव की सोच और प्राथमिकता में शौचालय शामिल ही नहीं है तो भला कौन अपना पैसा लगाकर उसे बनवा रहा है। मेरे ही गाँव में लगभग दो सौ लोग ऐसे हैं जिनके खाते में पैसा आ भी गया, खर्च भी हो गया लेकिन शौचालय के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी गई। 

    सुबह-शाम अपने घरों से बड़ी संख्या निकलने वाली भीड़ के अपने-अपने मकसद होते हैं। प्रधानी लड़ने वाले व्यक्ति के लिए जनसम्पर्क का, प्रेमी जोड़ों के लिए मिलन का, नशेड़ियों के लिए संगत का, चोरों के लिए खेतों की सब्ज़ियों साफ़ करने का, नौजवानों के लिए बकैती का, बच्चों के लिए खेलकूद का, महिलाओं के लिए जासूसी और चुगली का....एक और भी प्रजाति होती है जो कान में  ईयरफोन  ठूँस के  प्रकृति को  किसी दार्शनिक, वनस्पति शास्त्री या फिर पर्यावरणविद की तरह निहारती है।मतलब यह कल्चर लोगों ने अपनी सुविधानुसार जीवन में आत्मसात कर लिया है। ऐसा नहीं है कि गाँव बहुत निर्धन, अशिक्षित और पिछड़ा हुआ है। पैसा है, गाड़ी है, पक्का मकान है, लड़का पढ़ भी रहा है। ज्यादातर चीजें अब बदल चुकी हैं लेकिन शौचालय के लिए पता नहीं क्यों लोग आज भी इतने उदासीन हैं। कुछ लोगों के पास जगह की समस्या है क्योंकि घर बनवाते समय शौचालय के बारे में सोचे ही नहीं और बीबी घर के अंदर बनवाने नहीं दे रही क्योंकि उसी घर में खाना बनता है, पूजा होती है।बहुत सारी अड़चनों के बीच ग्राम प्रधान और सचिव लोगों को डरा धमका कर पैसा डाल तो दे रहे हैं लेकिन बनवा नहीं पा रहे हैं। सरकारी जाँच वगैरह पता नहीं कभी होगी भी या नहीं। 

    अबकी बार मैं गाँव गया था तो एकदिन ऐसे ही चार-छः दोस्तों के साथ एक दुकान के सामने खड़ा था। शाम हो गई थी। एक लड़का दनदनाते हुए आया और मुझसे कहा, "आप इन लोगों से कह दीजिये यहाँ से चलें जाएँ...नहीं तो अगर कोई घटना हुई तो इसके जिम्मेदार आप ही होंगे।" मैंने कहा, "क्यों ऐसी क्या बात है कि कोई घटना या दुर्घटना हो सकती है?" लड़के ने कहा,"दर'असल बात ये है कि शाम हो गई है और इस रास्ते से औरतें, लड़कियां खेतों की ओर जातीं हैं तो हम मर्दों को ये रास्ता खाली रखवाना पड़ता है।" मैंने कहा, "रास्ता खाली करवाने में मर्दानगी नहीं है, ऐसा करो कि महिलाओं को घर पर ही रोको, उनकी सुरक्षा की फ़िक्र है तो घर पर ही शौचालय बनवाओ। " अगले दिन मैंने देखा कि वो लड़का और ज्यादा लोगों के साथ थोड़ी और सख़्ती से राहगीरों को डाँट कर रास्ता खाली करवा रहा था।

गाँव- मेरी नज़र में

 गाँव अब वैसा नहीं है, जैसा कविता, कहानी और कल्पनाओं में मिलता है। सड़कों के जाल वहाँ भी बिछ गए हैं, बिजली के तार भी, कंक्रीट की दिवारें भी, गाड़ियों का शोर भी। मिट्टी में भी अब वो खूशबू नहीं, जहरीले उर्वरकों की बदबू आती है।दर'असल बड़ी मात्रा में ग्रामीण जनसंख्या शहरों की ओर पलायन कर गई और जो घर परिवार के जो लोग गाँव में बच गये वो भी शहरी जीवन अपना रहे हैं। घर के चारों ओर चारदीवारी, बडा़ सा गेट और गेट पर ताला।ये बड़े लोगों के घर हैं।इसमें बुराई भी नहीं यही तो आधुनिक युग का तथाकथित विकास है।यानि गाँव भी विकसित हो रहें हैं धीरे-धीरे।अपने काम से काम, चालबाज़ी, मुकदमे बाज़ी, मारपीट तो चरम पर है। जो अभी भी गाँव की आत्मा बचाये हुए हैं वो गरीब, गंवार और देहाती लोगों की श्रेणी में आते हैं।लोगों की जीवनशैली भी तेजी से बदल रही है। पैसों के पीछे भागने में खेती बाड़ी बेचकर शहर निकल जा रहे हैं लोग। गाँव वालों को भी गाँव काटता है अब। शहर वाले पागल हुए पड़े हैं उसी गाँव की सुंदरता निहारने के लिए। 

     पहले गाँव की गरीबी लोगों को शहर खींच लाती थी, अब की सोच, समझ, रहन सहन से लोगों को घृणा होने लगी है। नौजवानों में दारूबाजी का शौक चढ़ा है। मनरेगा में गए, काम किया, पैसा मिला और दारू चढ़ाकर बवाल काट रहे हैं। पढ़ने-लिखने से बहुत दूर होते जा रहे हैं लोग। गाँव का सबसे होनहार लड़का दिल्ली गया, साहेब बनने और अब दिल्लीवालों की मेहरबानी से सफेद बाल लेकर नौकरी के लिए थाली बजा रहा है। मतलब सरकारी नौकरी वाला मोहभंग होता जा रहा है। जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है तो खेती से खाने भर का ही बमुश्किल मयस्सर होता है। ग्रामीण युवा फिर से बड़ी मात्रा में शहरी मजदूर बन रहे हैं। कम उम्र में शादी, दहेज में दुपहिया और जोश में दू चार ठौ लइका।मर्द शहर में मजदूरी कर रहा, मेहरारू गाँव में, बच्चे मिड डे मील भरोसे। सुविधानुसार सोच तो बदल गई है लेकिन अपने मतलब के चीजों के लिए रूढ़िवादी सोच बरकरार है। औरत पर पाबंदी, लड़की पर कड़ा शासन, भूत प्रेत, जादू टोना, ऊँच नीच, अमीर गरीब के बीच वाली खाईं और भी गहरा गई है। बच्चे अब मैदानों में खेलते नहीं मिलते, किसी पुलिया पर बैठकर मोबाइल में अश्लील सिनेमा और भोजपुरी के फूहड़ गाने सुनते हुए मिलते हैं। इधर प्रेम विवाह का प्रचलन भी बहुत तेजी से चला है लेकिन उसके पीछे कोई प्रगति वादी सोच नहीं है बल्कि वह कानून है जो नाबालिग लड़की के बालात्कार की सज़ा में फांसी का प्रावधान है। जो लड़का नाबालिग लड़की के साथ पकड़ा गया, उसे डरके मारे सिंदूर पहनाना ही पड़ता है और इसी पछतावे में लड़की के ऊपर अत्याचार का एक स्थायी सिलसिला चल पड़ता है।मान-सम्मान जैसी कोई बात नहीं रह गई है। चुनाव वहाँ केवल फ्री का दारू पीने वाले मौसम की तरह आता है। फिर पाँच साल रोना-पिटना। टीवी देखकर बच्चा-बच्चा राजनीति, कूटनीति में महापंडित है। बिजली है लेकिन बस मोबाइल चार्ज करने भर की आती है। रोड़ है लेकिन हर बारिश में डूबकर टूट जाती है। जाति का ज़हर हर एक आदमी के दिमाग़ में भरा हुआ है। चौराहे शराबियों के लिए आरक्षित हो चुकें हैं। जिसके पास नौकरी है उसके जूते चाट लेंगे जो असफल होकर गाँव लौट गया उसके मुँह पर थूक देंगे। यहाँ फेसबुकियों कवियों की घनघोर काल्पनिक गाँव पर लिखी कविताएँ पढ़ता हूँ तो अपने जीवन का बीस-बाइस साल गाँव में गुजारने के बाद भी एक बारगी लगता है कि गाँव लौट जाऊँ।जब लौट जाता हूँ तो दो-चार दिन में फिर मोहभंग हो जाता है और फिर गाँव पर सुंदर सी कविता लिखने के लिए, शहर भाग आता हूँ।

पीड़ा

 सूरज तप रहा है...जब मन के भीतर अंधेरा गहराया हो तो बाहर की रोशनी आँखों को चुभने लगती है। सूरज का प्रकाश उसके हृदय को कुरेदता है। आह! कितना सुंदर था वो रात का अंधकार...वो सूनापन...वो उदासी। वही अच्छी लग रही थी, अपने जैसी लग रही थी। कितना दुःख देता है...स्वयं से भिन्न कुछ देख पाना, स्वीकार कर पाना। अपने से अलग कोई किसी को कभी अच्छा लगा है भला। कितने धर्म उपजे, कितनी क्रांतियाँ हुईं, कितने नरसंहार हुए। आखिर क्यों? क्योंकि नहीं सहन कर पाए लोग अपने से अलग विचार, आचार और व्यवहार। क्या मुझे भी उस सूरज को लील लेना चाहिए, उसका अस्तित्व मिटा देना चाहिए। धकेल देना चाहिए दुनिया को उसी विशाल, अमिट और डरावनी अंधेरी खाईं में, जिसमें मैं रोज घुट रहा हूँ, मर रहा हूँ?

ध्रुव

 नौवीं में मेरा दाखिला एक सरकारी कॉलेज में हो गया। सरकारी स्कूलों को लेकर उस समय लोगों के मन में उपेक्षा और डर व्याप्त थी। उसके शैक्षणिक मानक और अनुशासन को लेकर तरह-तरह की बातें होतीं रहतीं थीं। लेकिन फीस की सहूलियत और घर के करीब होने के कारण मेरे जैसे लगभग दो हज़ार बच्चे उस कॉलेज में पढ़ते थे। मेरी फीस 9 रूपये और मेरे घर से कॉलेज की दूरी लगभग 10 किलोमीटर थी। कम्प्यूटर विषय के लिए 30 रूपये अलग से शुल्क लगता था और कॉलेज जाने के लिए मुझे एक सायकिल मिल गई थी। सबके लिए एक ड्रेस कोड निर्धारित था। सप्ताह में एक दिन यानि वृहस्पतिवार को कुछ भी पहनने की छूट थी।

     पहले दिन मैं,उसी कॉलेज में पढ़ने वाले अपने बड़े भाई का,ड्रेस(जोकि मेरे साइज़ से बहुत बड़ा था) पहनकर अपनी कक्षा में दाखिल हुआ। क्लासरूम एक मैंदान की तरह था क्योंकि ऊपर छत तो थी लेकिन बीच की दीवार नहीं थी। चारो ओर खुले और प्रिंसिपल अॉफिस के ठीक सामने उस कमरे की सातवीं बेंच पर झोला(तांत का, हाथ से सिला हुआ) पटककर बैठ गया। पहली घंटी गणित की थी और पहले ही दिन टेस्ट होना था। 8 सवाल, 25 मिनट और दो पेज सुपुर्द कर दिया गया। टेस्ट शुरू हुआ...ज्यादातर सवाल मुझे आते भी थे...मैं फटाफट लगाने की कोशिश कर रहा था...तभी बगल से आवाज आई-भैया आप गलत लगा रहे हैं। पलट कर देखा तो एक लड़का, जो टेस्ट पूरा कर चुका था,मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देख रहा था। खैर, मैंने गलती को सुधारा। कॉपी जमा हुई। 20 मिनट बाद रिजल्ट आ गया। मेरा नाम टॉप फाइव में था। मैंने उस लड़के नाम पूछा.. उसने कहा मैं टॉपर्स में नहीं हूँ, वैसे मेरा नाम ध्रुव है। उसको छठवां और मुझे पाँचवाँ स्थान मिला। मैंने अपने ऊपर वाले चार नामों पर गौर किया। चारो लड़कियां थीं। उसी दिन अंग्रेज़ी का भी टेस्ट हुआ और मुझे पहला स्थान मिला। इनाम स्वरूप सातवीं बेंच से पहली बेंच पर स्थाई रूप से मेरा कब्ज़ा हो गया। वो लड़का वहीं छूट गया और अंत तक मेरे पीछे ही रहा। दिनरात मेहनत करके मैंने अपने ऊपर के चारो प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। मैं आत्ममुग्धता और आत्मविश्वास से ओतप्रोत था। मुझे दिखा ही नहीं कि मेरे पीछे दूसरे नंबर पर कौन है? 

     खैर,बोर्ड एग्ज़ाम से पहले प्री बोर्ड हुए। मैं टॉप कर गया और लोग मुझसे बहुत पीछे छूट गए। उस समय कॉलेज में टॉप करना बड़ी बात मानी जाती थी और बोर्ड में टॉप करने वाले का नाम हमेशा के लिए एक दिवार पर छाप दिया जाता था। वहाँ पढ़ने वाले हरेक छात्र के मन में उस दिवार पर अपना नाम देखने की ख्वाहिश जरूर होती थी। मैंने भी ये ख़्वाब देखा, उसके लिए मेहनत भी बहुत की। प्री बोर्ड के बाद मैं एकदम आश्वस्त हो गया कि बोर्ड एग्ज़ाम के बाद मेरा ही नाम उस दिवार पर होगा। बोर्ड हुआ, मेरे पेपर्स भी बहुत अच्छे हुए, रिजल्ट आया और पता चला कि दिवार पर मेरा नाम नहीं होगा। मैं बहुत निराश हो गया, कुछ लोगों ने स्क्रूटनी की सलाह दी लेकिन उसके पैसे नहीं मिले। मैं खुद से बहुत नाराज हो गया। मैंने वो कॉलेज छोड़ने का निर्णय ले लिया, मुझे बर्दाश्त नहीं था उसी कॉलेज में सेकंड टॉपर बनकर पढ़ना। मैंने दूसरे कॉलेज में इंट्रेंस दिया और पास भी हो गया। स्थानांतरण प्रमाण पत्र के लिए जब पुराने कॉलेज गया तो उस दिवार पर वर्ष 2010 के टॉपर का लिखा देखा- "ध्रुव कुमार (10th B)". वही ध्रुव कुमार जो बहुत कम बोलता था, दिव्यांग था, मुझसे सवाल पूछने आया करता था, बहुत सीधा, सादा एवं मृदुभाषी था, पीछे बैठता था, किसी टीचर का चहेता नहीं था, क्लास में अक्सर लेट आया करता था, जो मेरे पीछे हमेशा नंबर दो पे था लेकिन उस समय मेरी ध्यान में नहीं था। मैं उस समय गुस्से में नहीं था, खुद से निराश भी नहीं था। मुझे ज़रा भी आभास नहीं था कि ध्रुव टॉप कर सकता है। लेकिन ध्रुव ने ही किया था, उसी का नाम लिखा था उस दिवार पे। 

    मैंने वो कॉलेज छोड़ दिया। उसके बाद ध्रुव से कभी मुलाकात नहीं हुई। आज सोशलमीडिया से उस समय के बहुत सारे सहपाठी संपर्क में हैं लेकिन ध्रुव यहाँ भी कहीं नहीं मिला। बाद में मैंने सुना कि उसने पढ़ाई छोड़ दी है। उसके गाँव के एक लड़के से मुलाक़ात हुई तो उसने बताया कि ध्रुव बुरे दौर से गुजर रहा है। मैंने उसका मोबाइल नंबर मांगा तो उसने कहा कि ध्रुव मोबाइल नहीं चलाता। मैंने सोचा कि अबकी गाँव जाऊँगा तो ध्रुव से जरूर मिलकर आऊँगा। लेकिन मेरे गाँव जाने से पहले ही एक ऐसी सूचना मिली जिसने मुझे झकझोर दिया। ध्रुव ने आत्महत्या कर ली। उसके पीछे क्या कारण था? उसने क्यों ऐसा किया? इतने जल्दी? कोई जवाब नहीं। बस ये सच है कि ध्रुव नहीं रहा, कहाँ गया, क्यों गया, किसे पता? आत्महत्या कायर करते हैं, जो डर गया वो मर गया, जिंदगी लड़ने का नाम है...कितने अच्छे लगते हैं ये नारे...कितनी आसानी से ऐसा बोल कर निकल जातें हैं लोग...लेकिन ये सब मरने के बाद की बातें हैं...जीने वाले को कौन बताये कि रुक जा भाई अभी मरना नहीं है। 

   अलविदा ध्रुव! जहाँ हो खुश रहो...वैसे भी हम सभी अपना-अपना दुःख भोगकर देर सबेर तुम्हारे ही पास आयेंगे।

~ अभिषेक सिंह

मेरी मौत पर

 मैं चाहता हूँ-

मेरी  मौत  को  तमाशा  बनाया  जाये

मेरी लाश को गलियों में घुमाया जाये

ढोल- नगाड़े और सितार बजायें जायें

मेरी  विधवा  को  खूब  नचाया  जाये

उसकी चूड़ियाँ हथौड़े से  तोड़ी जायें

नालों में रगड़कर सिंदूर छुड़ाया जाये। 


लोग गालियाँ बकें मेरी करतूतों पर

थूकते जायें  मेरे मरे  हुए  बदन पर


मुझे न दफ़नाया जाये न जलाया जाये

मेरा गोश्त जानवरों को खिलाया जाये। 


मैं चाहता हूँ मेरी मौत पर कोई मातम न मनाये

मुझसे  लिपटकर  किसी को रोने न दिया जाये

मेरी दौलत शहर के भिखारियों में बाँट दी जाये

इसके खुशी में भूखे भेड़ियों को दावतें दी जायें। 


मेरे वारिसों पर लोग रहम के पत्थर फेंकें

झूठी  तस्सलियों के  गट्ठर भर-भर  भेजें। 


मेरी तस्वीरों पर कालिख पोतकर, 

उन्हें गंगा में बहा दिया जाये, 

मेरे कपड़े मेरी किताबें मेरा वजूद,

चौराहे पर जला दिया जाये! 


मैं चाहता हूँ मेरे मरने के बाद-

मैं कभी ज़िंदा था ऐसा कोई सबूत न छोड़ा जाये! 


~ अभिषेक सिंह