सरकार भले ही देश को 'खुले में शौच' से मुक्त कर चुकी हो लेकिन गाँवों में आज भी बड़ी संख्या में लोगों की पहली पसंद खेत-खलिहान ही है।ऐसा भी नहीं है कि शौचालय के लिए पैसा नहीं आया है गाँवों में। खूब पैसा आया है और ज्यादातर के खातों में पहुँच भी चुका है। लेकिन वह धनराशि केवल बारह हज़ार है। अब इतने पैसों में अच्छा शौचालय तो बन नहीं सकता है। यानि की शौचालय बनाने के लिए आदमी को अपनी जेब से भी कुछ पैसा लगाना पड़ेगा। अब गाँव की सोच और प्राथमिकता में शौचालय शामिल ही नहीं है तो भला कौन अपना पैसा लगाकर उसे बनवा रहा है। मेरे ही गाँव में लगभग दो सौ लोग ऐसे हैं जिनके खाते में पैसा आ भी गया, खर्च भी हो गया लेकिन शौचालय के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी गई।
सुबह-शाम अपने घरों से बड़ी संख्या निकलने वाली भीड़ के अपने-अपने मकसद होते हैं। प्रधानी लड़ने वाले व्यक्ति के लिए जनसम्पर्क का, प्रेमी जोड़ों के लिए मिलन का, नशेड़ियों के लिए संगत का, चोरों के लिए खेतों की सब्ज़ियों साफ़ करने का, नौजवानों के लिए बकैती का, बच्चों के लिए खेलकूद का, महिलाओं के लिए जासूसी और चुगली का....एक और भी प्रजाति होती है जो कान में ईयरफोन ठूँस के प्रकृति को किसी दार्शनिक, वनस्पति शास्त्री या फिर पर्यावरणविद की तरह निहारती है।मतलब यह कल्चर लोगों ने अपनी सुविधानुसार जीवन में आत्मसात कर लिया है। ऐसा नहीं है कि गाँव बहुत निर्धन, अशिक्षित और पिछड़ा हुआ है। पैसा है, गाड़ी है, पक्का मकान है, लड़का पढ़ भी रहा है। ज्यादातर चीजें अब बदल चुकी हैं लेकिन शौचालय के लिए पता नहीं क्यों लोग आज भी इतने उदासीन हैं। कुछ लोगों के पास जगह की समस्या है क्योंकि घर बनवाते समय शौचालय के बारे में सोचे ही नहीं और बीबी घर के अंदर बनवाने नहीं दे रही क्योंकि उसी घर में खाना बनता है, पूजा होती है।बहुत सारी अड़चनों के बीच ग्राम प्रधान और सचिव लोगों को डरा धमका कर पैसा डाल तो दे रहे हैं लेकिन बनवा नहीं पा रहे हैं। सरकारी जाँच वगैरह पता नहीं कभी होगी भी या नहीं।
अबकी बार मैं गाँव गया था तो एकदिन ऐसे ही चार-छः दोस्तों के साथ एक दुकान के सामने खड़ा था। शाम हो गई थी। एक लड़का दनदनाते हुए आया और मुझसे कहा, "आप इन लोगों से कह दीजिये यहाँ से चलें जाएँ...नहीं तो अगर कोई घटना हुई तो इसके जिम्मेदार आप ही होंगे।" मैंने कहा, "क्यों ऐसी क्या बात है कि कोई घटना या दुर्घटना हो सकती है?" लड़के ने कहा,"दर'असल बात ये है कि शाम हो गई है और इस रास्ते से औरतें, लड़कियां खेतों की ओर जातीं हैं तो हम मर्दों को ये रास्ता खाली रखवाना पड़ता है।" मैंने कहा, "रास्ता खाली करवाने में मर्दानगी नहीं है, ऐसा करो कि महिलाओं को घर पर ही रोको, उनकी सुरक्षा की फ़िक्र है तो घर पर ही शौचालय बनवाओ। " अगले दिन मैंने देखा कि वो लड़का और ज्यादा लोगों के साथ थोड़ी और सख़्ती से राहगीरों को डाँट कर रास्ता खाली करवा रहा था।
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