Monday, 23 November 2020

सनसनीखेज खबरों का व्यापार

 ये न्यूज़ एंकर्स जिस घटियापन से रिपोर्टिंग कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि वेब और प्रिंट मीडिया के लिए सुनहरा अवसर आने वाला है। टेलीविजन वालों के शोज़ अब केवल मीम्स बनाने के लिए ही लोग देखते हैं। अखबारों को अब 'समोसे के तेल सुखाने' वाली इमेज से बाहर आना चाहिए। लोग उनकी तरफ उम्मीद लगा कर बैठे हैं। खबरों का स्तर इसलिए भी गिरता जा रहा है क्योंकि उनके लिए हम अपनी जेब नहीं हल्की करना चाहते। फ्री में न्यूज़ पाने की लालसा रखियेगा तो वही मिलेगा जो कोई पैसे देकर आप तक पहुँचायेगा। फिर आपको शिकायत होती कि अरे भई सही सूचना तो मिल ही नहीं रही है। सब फेक़, प्रोपेगेंडा और एजेण्डा चला रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस फील्ड को भी नेताओं, बाहुबलियों और बिज़नेस मैन ने कैप्चर कर लिया है। न कुछ खुल कर लिख सकते हैं, न बोल सकते हैं और न ही छाप सकते हैं। और जिन्होंने इसके ख़िलाफ़ जाने की कोशिश की, वो या तो नौकरी से हाथ धो बैठता है या फिर जान से। इधर हिंदी की दो पत्रिकाएँ बंद होने की खबर है, लोग फेसबुक पर रो रहे हैं। ये वही लोग हैं जो हिंदी बोलने, पढ़ने में भी लजाते हैं। अगर पर्याप्त पाठक मिलते तो कोई क्यों ही भला बंद करता। बाकी रात बहुत हो गई है...अपने पसंद का कोई कार्टून न्यूज़ सुनकर सो जाइए...!!

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