पियक्कड़, शराबी से एक पायदान ऊपर होतें हैं।गाँव में पियक्कड़ों का बोलबाला चलता है।शाम को नहाये-धोये, सायकल निकाले, गेहूँ लादा और निकल पड़े मयखाने की ओर।चौराहे पे गये तो संगत मिली,चंदा लगा और आ गई दो-चार शीशी। जैसे-जैसे चढ़ना शुरू होता, वैसे-वैसे लहजा बदलता जाता है।गाली-गलौज, मारपीट करके आधा नशा उतरवाकर किसी तरह घर पहुँचते हैं।मेहरारू देखते ही बड़बड़ाने लगती है।पियक्कड़ को आत्मग्लानि हो जाती है, उसी ग्लानि में बीबी, बच्चों को पीट कर खाने की थाली फेंककर गरियाता हुआ गाँव में निकल जाता है। बीबी पीछे-पीछे पहुँचती है। पियक्कड़ को अब और आत्मग्लानि होती है तो जो सामने मिलता उसी गरियाने लगता है।चूँकि गाँव की तरफ पियक्कड़ बहुत ज्यादा हैं इसलिए गाँव वाले उनसे सहानुभूति भी रखते हैं। चाहे जितना गरिया ले लेकिन चूँ नहीं करते हैं। अगर किसी ने पलटकर जवाब दे दिया तो सुबह पंचायत में फटकारा जाता है कि भई उसने तो पी रखी थी, तुम तो होश में थे..तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।इसलिए गाँव में जो होश में है उसे गरियाने का अधिकार प्राप्त है.. एक पियक्कड़ को। अब मुसीबत तब आती है जब पियक्कड़ से दूसरा पियक्कड़ टकरा जाता है। शेर के आगे शेर, दारू की इज़्ज़त का सवाल है तो पीछे हटने का कोई कारण ही नहीं है। दोनों भिड़ गए, दोनों की बीबियाँ घर की ओर भागीं। दोनों खानदान आमने-सामने।दोनों सेनाएँ हुंकार भरने लगती हैं। अब यहाँ से शुरू होता है असली मनोरंजन पूरे दो-तीन घंटे का एक शो। पूरा गाँव घेर कर तमाशा देखता है। किसी तरह दोनों पियक्कड़ थककर गले मिलते हैं और घर लौट आते हैं।घर का सबसे बड़ा लड़का ये सब देखता है और अपने बाप से भिड़ जाता है, बाप उसको बल भर कूट देता। महतारी रोते हुए हल्दी प्याज बाँधती है। पियक्कड़ को सुबह अपनी गलती का अहसास होता है लेकिन शाम तक बेचारा फिर बेबस होकर ठेके तरफ निकल पड़ता है। वहाँ देखता है कि बेटा पहले से ही लाइन लगाकर खड़ा है...कुछ बोलना चाहता ही है कि उसे बेटे की आँखों में अपने से भी ज्यादा ग्लानि नज़र आती है। उसी दिन बाप की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। अब बेटा रोज़ पीकर आता है और आत्मग्लानि में बाप को दस बीस गालियाँ, दो चार थप्पड़ रसीद कर देता है। यही चक्र चलता रहता है।
No comments:
Post a Comment