गाँव अब वैसा नहीं है, जैसा कविता, कहानी और कल्पनाओं में मिलता है। सड़कों के जाल वहाँ भी बिछ गए हैं, बिजली के तार भी, कंक्रीट की दिवारें भी, गाड़ियों का शोर भी। मिट्टी में भी अब वो खूशबू नहीं, जहरीले उर्वरकों की बदबू आती है।दर'असल बड़ी मात्रा में ग्रामीण जनसंख्या शहरों की ओर पलायन कर गई और जो घर परिवार के जो लोग गाँव में बच गये वो भी शहरी जीवन अपना रहे हैं। घर के चारों ओर चारदीवारी, बडा़ सा गेट और गेट पर ताला।ये बड़े लोगों के घर हैं।इसमें बुराई भी नहीं यही तो आधुनिक युग का तथाकथित विकास है।यानि गाँव भी विकसित हो रहें हैं धीरे-धीरे।अपने काम से काम, चालबाज़ी, मुकदमे बाज़ी, मारपीट तो चरम पर है। जो अभी भी गाँव की आत्मा बचाये हुए हैं वो गरीब, गंवार और देहाती लोगों की श्रेणी में आते हैं।लोगों की जीवनशैली भी तेजी से बदल रही है। पैसों के पीछे भागने में खेती बाड़ी बेचकर शहर निकल जा रहे हैं लोग। गाँव वालों को भी गाँव काटता है अब। शहर वाले पागल हुए पड़े हैं उसी गाँव की सुंदरता निहारने के लिए।
पहले गाँव की गरीबी लोगों को शहर खींच लाती थी, अब की सोच, समझ, रहन सहन से लोगों को घृणा होने लगी है। नौजवानों में दारूबाजी का शौक चढ़ा है। मनरेगा में गए, काम किया, पैसा मिला और दारू चढ़ाकर बवाल काट रहे हैं। पढ़ने-लिखने से बहुत दूर होते जा रहे हैं लोग। गाँव का सबसे होनहार लड़का दिल्ली गया, साहेब बनने और अब दिल्लीवालों की मेहरबानी से सफेद बाल लेकर नौकरी के लिए थाली बजा रहा है। मतलब सरकारी नौकरी वाला मोहभंग होता जा रहा है। जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है तो खेती से खाने भर का ही बमुश्किल मयस्सर होता है। ग्रामीण युवा फिर से बड़ी मात्रा में शहरी मजदूर बन रहे हैं। कम उम्र में शादी, दहेज में दुपहिया और जोश में दू चार ठौ लइका।मर्द शहर में मजदूरी कर रहा, मेहरारू गाँव में, बच्चे मिड डे मील भरोसे। सुविधानुसार सोच तो बदल गई है लेकिन अपने मतलब के चीजों के लिए रूढ़िवादी सोच बरकरार है। औरत पर पाबंदी, लड़की पर कड़ा शासन, भूत प्रेत, जादू टोना, ऊँच नीच, अमीर गरीब के बीच वाली खाईं और भी गहरा गई है। बच्चे अब मैदानों में खेलते नहीं मिलते, किसी पुलिया पर बैठकर मोबाइल में अश्लील सिनेमा और भोजपुरी के फूहड़ गाने सुनते हुए मिलते हैं। इधर प्रेम विवाह का प्रचलन भी बहुत तेजी से चला है लेकिन उसके पीछे कोई प्रगति वादी सोच नहीं है बल्कि वह कानून है जो नाबालिग लड़की के बालात्कार की सज़ा में फांसी का प्रावधान है। जो लड़का नाबालिग लड़की के साथ पकड़ा गया, उसे डरके मारे सिंदूर पहनाना ही पड़ता है और इसी पछतावे में लड़की के ऊपर अत्याचार का एक स्थायी सिलसिला चल पड़ता है।मान-सम्मान जैसी कोई बात नहीं रह गई है। चुनाव वहाँ केवल फ्री का दारू पीने वाले मौसम की तरह आता है। फिर पाँच साल रोना-पिटना। टीवी देखकर बच्चा-बच्चा राजनीति, कूटनीति में महापंडित है। बिजली है लेकिन बस मोबाइल चार्ज करने भर की आती है। रोड़ है लेकिन हर बारिश में डूबकर टूट जाती है। जाति का ज़हर हर एक आदमी के दिमाग़ में भरा हुआ है। चौराहे शराबियों के लिए आरक्षित हो चुकें हैं। जिसके पास नौकरी है उसके जूते चाट लेंगे जो असफल होकर गाँव लौट गया उसके मुँह पर थूक देंगे। यहाँ फेसबुकियों कवियों की घनघोर काल्पनिक गाँव पर लिखी कविताएँ पढ़ता हूँ तो अपने जीवन का बीस-बाइस साल गाँव में गुजारने के बाद भी एक बारगी लगता है कि गाँव लौट जाऊँ।जब लौट जाता हूँ तो दो-चार दिन में फिर मोहभंग हो जाता है और फिर गाँव पर सुंदर सी कविता लिखने के लिए, शहर भाग आता हूँ।
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