हम असंतुष्ट,अतृप्त,अनियंत्रित प्रजाति से हैं।हमें शांति, सौहार्द, प्रेम समझ में ही नहीं आता।हलांकि हममें से ज्यादातर लोग लगातार इन्हीं विषयों में घिरे रहते हैं।पहले हम जंगली थे।अलग थलग रहते थे।जंगल के ताकतवर जानवरों से भागते-फिरते, आपस में लड़ते-भिड़ते।फिर हमें साथ रहने की आवश्यकता महसूस हुई।परिवार बना, समाज बना, नियम-कानून बनें, धर्म बना।आग मिली, विज्ञान मिला, ताकत मिली, बुद्धि मिली।फिर लालच का जन्म हुआ। आपस में कटने-मरने लगे,सत्ता के लिए, शक्ति के लिए, जमीन के लिए, जोरू के लिए। तमाम शहर, घर, देश को उजाड़ने के बाद ऊब गए। तमाम संगठन बनाये... शांति, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए। पूरी दुनिया को एकसाथ एकजुट रहने के लिए प्रेरित करने लगे। हमने नदियाँ सुखाई, जंगल काटे, पहाड़ो को तोड़ा फिर इन्हीं को जोड़कर घर बनाया। ये भी नहीं जमा तो घर भी तोड़ दिए, समाज तोड़ दिए और अकेले रहने में ज्यादा स्वतंत्रता और सुख मिलने लगा। अकेले रहते रहते अवसाद से घिर गए फिर सोशल होने की कोशिश कर रहे हैं। ये भी नहीं जम रहा तो तमाम प्रकार के धार्मिक, जातीय और लैंगिक झगड़े पैदा कर लिए। अभी तक ये सब कूल लग रहा है, कुछ दिन में इससे भी ऊब जायेंगे। कयामत कहीं और से नहीं आयेगी। एकदिन हम ही बौरा जायेंगे और जला डालेंगे सारी दुनिया।
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