Monday, 23 November 2020

पीड़ा

 सूरज तप रहा है...जब मन के भीतर अंधेरा गहराया हो तो बाहर की रोशनी आँखों को चुभने लगती है। सूरज का प्रकाश उसके हृदय को कुरेदता है। आह! कितना सुंदर था वो रात का अंधकार...वो सूनापन...वो उदासी। वही अच्छी लग रही थी, अपने जैसी लग रही थी। कितना दुःख देता है...स्वयं से भिन्न कुछ देख पाना, स्वीकार कर पाना। अपने से अलग कोई किसी को कभी अच्छा लगा है भला। कितने धर्म उपजे, कितनी क्रांतियाँ हुईं, कितने नरसंहार हुए। आखिर क्यों? क्योंकि नहीं सहन कर पाए लोग अपने से अलग विचार, आचार और व्यवहार। क्या मुझे भी उस सूरज को लील लेना चाहिए, उसका अस्तित्व मिटा देना चाहिए। धकेल देना चाहिए दुनिया को उसी विशाल, अमिट और डरावनी अंधेरी खाईं में, जिसमें मैं रोज घुट रहा हूँ, मर रहा हूँ?

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