नौवीं में मेरा दाखिला एक सरकारी कॉलेज में हो गया। सरकारी स्कूलों को लेकर उस समय लोगों के मन में उपेक्षा और डर व्याप्त थी। उसके शैक्षणिक मानक और अनुशासन को लेकर तरह-तरह की बातें होतीं रहतीं थीं। लेकिन फीस की सहूलियत और घर के करीब होने के कारण मेरे जैसे लगभग दो हज़ार बच्चे उस कॉलेज में पढ़ते थे। मेरी फीस 9 रूपये और मेरे घर से कॉलेज की दूरी लगभग 10 किलोमीटर थी। कम्प्यूटर विषय के लिए 30 रूपये अलग से शुल्क लगता था और कॉलेज जाने के लिए मुझे एक सायकिल मिल गई थी। सबके लिए एक ड्रेस कोड निर्धारित था। सप्ताह में एक दिन यानि वृहस्पतिवार को कुछ भी पहनने की छूट थी।
पहले दिन मैं,उसी कॉलेज में पढ़ने वाले अपने बड़े भाई का,ड्रेस(जोकि मेरे साइज़ से बहुत बड़ा था) पहनकर अपनी कक्षा में दाखिल हुआ। क्लासरूम एक मैंदान की तरह था क्योंकि ऊपर छत तो थी लेकिन बीच की दीवार नहीं थी। चारो ओर खुले और प्रिंसिपल अॉफिस के ठीक सामने उस कमरे की सातवीं बेंच पर झोला(तांत का, हाथ से सिला हुआ) पटककर बैठ गया। पहली घंटी गणित की थी और पहले ही दिन टेस्ट होना था। 8 सवाल, 25 मिनट और दो पेज सुपुर्द कर दिया गया। टेस्ट शुरू हुआ...ज्यादातर सवाल मुझे आते भी थे...मैं फटाफट लगाने की कोशिश कर रहा था...तभी बगल से आवाज आई-भैया आप गलत लगा रहे हैं। पलट कर देखा तो एक लड़का, जो टेस्ट पूरा कर चुका था,मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देख रहा था। खैर, मैंने गलती को सुधारा। कॉपी जमा हुई। 20 मिनट बाद रिजल्ट आ गया। मेरा नाम टॉप फाइव में था। मैंने उस लड़के नाम पूछा.. उसने कहा मैं टॉपर्स में नहीं हूँ, वैसे मेरा नाम ध्रुव है। उसको छठवां और मुझे पाँचवाँ स्थान मिला। मैंने अपने ऊपर वाले चार नामों पर गौर किया। चारो लड़कियां थीं। उसी दिन अंग्रेज़ी का भी टेस्ट हुआ और मुझे पहला स्थान मिला। इनाम स्वरूप सातवीं बेंच से पहली बेंच पर स्थाई रूप से मेरा कब्ज़ा हो गया। वो लड़का वहीं छूट गया और अंत तक मेरे पीछे ही रहा। दिनरात मेहनत करके मैंने अपने ऊपर के चारो प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। मैं आत्ममुग्धता और आत्मविश्वास से ओतप्रोत था। मुझे दिखा ही नहीं कि मेरे पीछे दूसरे नंबर पर कौन है?
खैर,बोर्ड एग्ज़ाम से पहले प्री बोर्ड हुए। मैं टॉप कर गया और लोग मुझसे बहुत पीछे छूट गए। उस समय कॉलेज में टॉप करना बड़ी बात मानी जाती थी और बोर्ड में टॉप करने वाले का नाम हमेशा के लिए एक दिवार पर छाप दिया जाता था। वहाँ पढ़ने वाले हरेक छात्र के मन में उस दिवार पर अपना नाम देखने की ख्वाहिश जरूर होती थी। मैंने भी ये ख़्वाब देखा, उसके लिए मेहनत भी बहुत की। प्री बोर्ड के बाद मैं एकदम आश्वस्त हो गया कि बोर्ड एग्ज़ाम के बाद मेरा ही नाम उस दिवार पर होगा। बोर्ड हुआ, मेरे पेपर्स भी बहुत अच्छे हुए, रिजल्ट आया और पता चला कि दिवार पर मेरा नाम नहीं होगा। मैं बहुत निराश हो गया, कुछ लोगों ने स्क्रूटनी की सलाह दी लेकिन उसके पैसे नहीं मिले। मैं खुद से बहुत नाराज हो गया। मैंने वो कॉलेज छोड़ने का निर्णय ले लिया, मुझे बर्दाश्त नहीं था उसी कॉलेज में सेकंड टॉपर बनकर पढ़ना। मैंने दूसरे कॉलेज में इंट्रेंस दिया और पास भी हो गया। स्थानांतरण प्रमाण पत्र के लिए जब पुराने कॉलेज गया तो उस दिवार पर वर्ष 2010 के टॉपर का लिखा देखा- "ध्रुव कुमार (10th B)". वही ध्रुव कुमार जो बहुत कम बोलता था, दिव्यांग था, मुझसे सवाल पूछने आया करता था, बहुत सीधा, सादा एवं मृदुभाषी था, पीछे बैठता था, किसी टीचर का चहेता नहीं था, क्लास में अक्सर लेट आया करता था, जो मेरे पीछे हमेशा नंबर दो पे था लेकिन उस समय मेरी ध्यान में नहीं था। मैं उस समय गुस्से में नहीं था, खुद से निराश भी नहीं था। मुझे ज़रा भी आभास नहीं था कि ध्रुव टॉप कर सकता है। लेकिन ध्रुव ने ही किया था, उसी का नाम लिखा था उस दिवार पे।
मैंने वो कॉलेज छोड़ दिया। उसके बाद ध्रुव से कभी मुलाकात नहीं हुई। आज सोशलमीडिया से उस समय के बहुत सारे सहपाठी संपर्क में हैं लेकिन ध्रुव यहाँ भी कहीं नहीं मिला। बाद में मैंने सुना कि उसने पढ़ाई छोड़ दी है। उसके गाँव के एक लड़के से मुलाक़ात हुई तो उसने बताया कि ध्रुव बुरे दौर से गुजर रहा है। मैंने उसका मोबाइल नंबर मांगा तो उसने कहा कि ध्रुव मोबाइल नहीं चलाता। मैंने सोचा कि अबकी गाँव जाऊँगा तो ध्रुव से जरूर मिलकर आऊँगा। लेकिन मेरे गाँव जाने से पहले ही एक ऐसी सूचना मिली जिसने मुझे झकझोर दिया। ध्रुव ने आत्महत्या कर ली। उसके पीछे क्या कारण था? उसने क्यों ऐसा किया? इतने जल्दी? कोई जवाब नहीं। बस ये सच है कि ध्रुव नहीं रहा, कहाँ गया, क्यों गया, किसे पता? आत्महत्या कायर करते हैं, जो डर गया वो मर गया, जिंदगी लड़ने का नाम है...कितने अच्छे लगते हैं ये नारे...कितनी आसानी से ऐसा बोल कर निकल जातें हैं लोग...लेकिन ये सब मरने के बाद की बातें हैं...जीने वाले को कौन बताये कि रुक जा भाई अभी मरना नहीं है।
अलविदा ध्रुव! जहाँ हो खुश रहो...वैसे भी हम सभी अपना-अपना दुःख भोगकर देर सबेर तुम्हारे ही पास आयेंगे।
~ अभिषेक सिंह
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