अर्जेंटीना के महान फुटबॉल खिलाड़ी डिएगो माराडोना का कार्डियक अरेस्ट के कारण आज निधन हो गया। कुछ दिनों पहले दिमाग़ में क्लाटिंग के लिए उनका ऑपरेशन हुआ था।1986 में अर्जेंटीना को अपनी कप्तानी में फुटबॉल चैंपियन बनाने वाले माराडोना विश्व के महानतम फुटबॉल खिलाड़ियों में से एक थे। 1982 के फुटबॉल विश्व कप में मात्र 21 साल के माराडोना ने सुर्खियां बटोरकर सबका ध्यान आकर्षित किया। थोड़े ही दिनों में वो अपने देश के लिए स्टार खिलाड़ी और दुनिया के मशहूर फुटबॉल क्लबों के लिए प्रमुख खिलाड़ी बन गए। माराडोना बर्सिलोना और नेपाली के लिए भी खेले। उन्होंने अपने के लिए 91 मैचों में 34 गोल दागे और चार बार विश्व कप में अपनी टीम के अगुआ रहे। 1991 में ड्रग्स लेने के लिए उन्हें 15 महीने का प्रतिबंध भी झेलना पड़ा। 1997 में 37 साल के माराडोना ने अपने यादगार फुटबॉल कैरियर को अलविदा कह दिया।
अभिव्यक्ति
उनकी आवाजें जो सरकारों के कानों तक पहुँचने से पहले दबा दी जातीं हैं।
Wednesday, 25 November 2020
Monday, 23 November 2020
हमारा मौलिक स्वभाव
हम असंतुष्ट,अतृप्त,अनियंत्रित प्रजाति से हैं।हमें शांति, सौहार्द, प्रेम समझ में ही नहीं आता।हलांकि हममें से ज्यादातर लोग लगातार इन्हीं विषयों में घिरे रहते हैं।पहले हम जंगली थे।अलग थलग रहते थे।जंगल के ताकतवर जानवरों से भागते-फिरते, आपस में लड़ते-भिड़ते।फिर हमें साथ रहने की आवश्यकता महसूस हुई।परिवार बना, समाज बना, नियम-कानून बनें, धर्म बना।आग मिली, विज्ञान मिला, ताकत मिली, बुद्धि मिली।फिर लालच का जन्म हुआ। आपस में कटने-मरने लगे,सत्ता के लिए, शक्ति के लिए, जमीन के लिए, जोरू के लिए। तमाम शहर, घर, देश को उजाड़ने के बाद ऊब गए। तमाम संगठन बनाये... शांति, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए। पूरी दुनिया को एकसाथ एकजुट रहने के लिए प्रेरित करने लगे। हमने नदियाँ सुखाई, जंगल काटे, पहाड़ो को तोड़ा फिर इन्हीं को जोड़कर घर बनाया। ये भी नहीं जमा तो घर भी तोड़ दिए, समाज तोड़ दिए और अकेले रहने में ज्यादा स्वतंत्रता और सुख मिलने लगा। अकेले रहते रहते अवसाद से घिर गए फिर सोशल होने की कोशिश कर रहे हैं। ये भी नहीं जम रहा तो तमाम प्रकार के धार्मिक, जातीय और लैंगिक झगड़े पैदा कर लिए। अभी तक ये सब कूल लग रहा है, कुछ दिन में इससे भी ऊब जायेंगे। कयामत कहीं और से नहीं आयेगी। एकदिन हम ही बौरा जायेंगे और जला डालेंगे सारी दुनिया।
सनसनीखेज खबरों का व्यापार
ये न्यूज़ एंकर्स जिस घटियापन से रिपोर्टिंग कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि वेब और प्रिंट मीडिया के लिए सुनहरा अवसर आने वाला है। टेलीविजन वालों के शोज़ अब केवल मीम्स बनाने के लिए ही लोग देखते हैं। अखबारों को अब 'समोसे के तेल सुखाने' वाली इमेज से बाहर आना चाहिए। लोग उनकी तरफ उम्मीद लगा कर बैठे हैं। खबरों का स्तर इसलिए भी गिरता जा रहा है क्योंकि उनके लिए हम अपनी जेब नहीं हल्की करना चाहते। फ्री में न्यूज़ पाने की लालसा रखियेगा तो वही मिलेगा जो कोई पैसे देकर आप तक पहुँचायेगा। फिर आपको शिकायत होती कि अरे भई सही सूचना तो मिल ही नहीं रही है। सब फेक़, प्रोपेगेंडा और एजेण्डा चला रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस फील्ड को भी नेताओं, बाहुबलियों और बिज़नेस मैन ने कैप्चर कर लिया है। न कुछ खुल कर लिख सकते हैं, न बोल सकते हैं और न ही छाप सकते हैं। और जिन्होंने इसके ख़िलाफ़ जाने की कोशिश की, वो या तो नौकरी से हाथ धो बैठता है या फिर जान से। इधर हिंदी की दो पत्रिकाएँ बंद होने की खबर है, लोग फेसबुक पर रो रहे हैं। ये वही लोग हैं जो हिंदी बोलने, पढ़ने में भी लजाते हैं। अगर पर्याप्त पाठक मिलते तो कोई क्यों ही भला बंद करता। बाकी रात बहुत हो गई है...अपने पसंद का कोई कार्टून न्यूज़ सुनकर सो जाइए...!!
शराब की संस्कृति
पियक्कड़, शराबी से एक पायदान ऊपर होतें हैं।गाँव में पियक्कड़ों का बोलबाला चलता है।शाम को नहाये-धोये, सायकल निकाले, गेहूँ लादा और निकल पड़े मयखाने की ओर।चौराहे पे गये तो संगत मिली,चंदा लगा और आ गई दो-चार शीशी। जैसे-जैसे चढ़ना शुरू होता, वैसे-वैसे लहजा बदलता जाता है।गाली-गलौज, मारपीट करके आधा नशा उतरवाकर किसी तरह घर पहुँचते हैं।मेहरारू देखते ही बड़बड़ाने लगती है।पियक्कड़ को आत्मग्लानि हो जाती है, उसी ग्लानि में बीबी, बच्चों को पीट कर खाने की थाली फेंककर गरियाता हुआ गाँव में निकल जाता है। बीबी पीछे-पीछे पहुँचती है। पियक्कड़ को अब और आत्मग्लानि होती है तो जो सामने मिलता उसी गरियाने लगता है।चूँकि गाँव की तरफ पियक्कड़ बहुत ज्यादा हैं इसलिए गाँव वाले उनसे सहानुभूति भी रखते हैं। चाहे जितना गरिया ले लेकिन चूँ नहीं करते हैं। अगर किसी ने पलटकर जवाब दे दिया तो सुबह पंचायत में फटकारा जाता है कि भई उसने तो पी रखी थी, तुम तो होश में थे..तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।इसलिए गाँव में जो होश में है उसे गरियाने का अधिकार प्राप्त है.. एक पियक्कड़ को। अब मुसीबत तब आती है जब पियक्कड़ से दूसरा पियक्कड़ टकरा जाता है। शेर के आगे शेर, दारू की इज़्ज़त का सवाल है तो पीछे हटने का कोई कारण ही नहीं है। दोनों भिड़ गए, दोनों की बीबियाँ घर की ओर भागीं। दोनों खानदान आमने-सामने।दोनों सेनाएँ हुंकार भरने लगती हैं। अब यहाँ से शुरू होता है असली मनोरंजन पूरे दो-तीन घंटे का एक शो। पूरा गाँव घेर कर तमाशा देखता है। किसी तरह दोनों पियक्कड़ थककर गले मिलते हैं और घर लौट आते हैं।घर का सबसे बड़ा लड़का ये सब देखता है और अपने बाप से भिड़ जाता है, बाप उसको बल भर कूट देता। महतारी रोते हुए हल्दी प्याज बाँधती है। पियक्कड़ को सुबह अपनी गलती का अहसास होता है लेकिन शाम तक बेचारा फिर बेबस होकर ठेके तरफ निकल पड़ता है। वहाँ देखता है कि बेटा पहले से ही लाइन लगाकर खड़ा है...कुछ बोलना चाहता ही है कि उसे बेटे की आँखों में अपने से भी ज्यादा ग्लानि नज़र आती है। उसी दिन बाप की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। अब बेटा रोज़ पीकर आता है और आत्मग्लानि में बाप को दस बीस गालियाँ, दो चार थप्पड़ रसीद कर देता है। यही चक्र चलता रहता है।
शौचालय सिर्फ सोच नहीं,संस्कृति भी बननी चाहिए
सरकार भले ही देश को 'खुले में शौच' से मुक्त कर चुकी हो लेकिन गाँवों में आज भी बड़ी संख्या में लोगों की पहली पसंद खेत-खलिहान ही है।ऐसा भी नहीं है कि शौचालय के लिए पैसा नहीं आया है गाँवों में। खूब पैसा आया है और ज्यादातर के खातों में पहुँच भी चुका है। लेकिन वह धनराशि केवल बारह हज़ार है। अब इतने पैसों में अच्छा शौचालय तो बन नहीं सकता है। यानि की शौचालय बनाने के लिए आदमी को अपनी जेब से भी कुछ पैसा लगाना पड़ेगा। अब गाँव की सोच और प्राथमिकता में शौचालय शामिल ही नहीं है तो भला कौन अपना पैसा लगाकर उसे बनवा रहा है। मेरे ही गाँव में लगभग दो सौ लोग ऐसे हैं जिनके खाते में पैसा आ भी गया, खर्च भी हो गया लेकिन शौचालय के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी गई।
सुबह-शाम अपने घरों से बड़ी संख्या निकलने वाली भीड़ के अपने-अपने मकसद होते हैं। प्रधानी लड़ने वाले व्यक्ति के लिए जनसम्पर्क का, प्रेमी जोड़ों के लिए मिलन का, नशेड़ियों के लिए संगत का, चोरों के लिए खेतों की सब्ज़ियों साफ़ करने का, नौजवानों के लिए बकैती का, बच्चों के लिए खेलकूद का, महिलाओं के लिए जासूसी और चुगली का....एक और भी प्रजाति होती है जो कान में ईयरफोन ठूँस के प्रकृति को किसी दार्शनिक, वनस्पति शास्त्री या फिर पर्यावरणविद की तरह निहारती है।मतलब यह कल्चर लोगों ने अपनी सुविधानुसार जीवन में आत्मसात कर लिया है। ऐसा नहीं है कि गाँव बहुत निर्धन, अशिक्षित और पिछड़ा हुआ है। पैसा है, गाड़ी है, पक्का मकान है, लड़का पढ़ भी रहा है। ज्यादातर चीजें अब बदल चुकी हैं लेकिन शौचालय के लिए पता नहीं क्यों लोग आज भी इतने उदासीन हैं। कुछ लोगों के पास जगह की समस्या है क्योंकि घर बनवाते समय शौचालय के बारे में सोचे ही नहीं और बीबी घर के अंदर बनवाने नहीं दे रही क्योंकि उसी घर में खाना बनता है, पूजा होती है।बहुत सारी अड़चनों के बीच ग्राम प्रधान और सचिव लोगों को डरा धमका कर पैसा डाल तो दे रहे हैं लेकिन बनवा नहीं पा रहे हैं। सरकारी जाँच वगैरह पता नहीं कभी होगी भी या नहीं।
अबकी बार मैं गाँव गया था तो एकदिन ऐसे ही चार-छः दोस्तों के साथ एक दुकान के सामने खड़ा था। शाम हो गई थी। एक लड़का दनदनाते हुए आया और मुझसे कहा, "आप इन लोगों से कह दीजिये यहाँ से चलें जाएँ...नहीं तो अगर कोई घटना हुई तो इसके जिम्मेदार आप ही होंगे।" मैंने कहा, "क्यों ऐसी क्या बात है कि कोई घटना या दुर्घटना हो सकती है?" लड़के ने कहा,"दर'असल बात ये है कि शाम हो गई है और इस रास्ते से औरतें, लड़कियां खेतों की ओर जातीं हैं तो हम मर्दों को ये रास्ता खाली रखवाना पड़ता है।" मैंने कहा, "रास्ता खाली करवाने में मर्दानगी नहीं है, ऐसा करो कि महिलाओं को घर पर ही रोको, उनकी सुरक्षा की फ़िक्र है तो घर पर ही शौचालय बनवाओ। " अगले दिन मैंने देखा कि वो लड़का और ज्यादा लोगों के साथ थोड़ी और सख़्ती से राहगीरों को डाँट कर रास्ता खाली करवा रहा था।
गाँव- मेरी नज़र में
गाँव अब वैसा नहीं है, जैसा कविता, कहानी और कल्पनाओं में मिलता है। सड़कों के जाल वहाँ भी बिछ गए हैं, बिजली के तार भी, कंक्रीट की दिवारें भी, गाड़ियों का शोर भी। मिट्टी में भी अब वो खूशबू नहीं, जहरीले उर्वरकों की बदबू आती है।दर'असल बड़ी मात्रा में ग्रामीण जनसंख्या शहरों की ओर पलायन कर गई और जो घर परिवार के जो लोग गाँव में बच गये वो भी शहरी जीवन अपना रहे हैं। घर के चारों ओर चारदीवारी, बडा़ सा गेट और गेट पर ताला।ये बड़े लोगों के घर हैं।इसमें बुराई भी नहीं यही तो आधुनिक युग का तथाकथित विकास है।यानि गाँव भी विकसित हो रहें हैं धीरे-धीरे।अपने काम से काम, चालबाज़ी, मुकदमे बाज़ी, मारपीट तो चरम पर है। जो अभी भी गाँव की आत्मा बचाये हुए हैं वो गरीब, गंवार और देहाती लोगों की श्रेणी में आते हैं।लोगों की जीवनशैली भी तेजी से बदल रही है। पैसों के पीछे भागने में खेती बाड़ी बेचकर शहर निकल जा रहे हैं लोग। गाँव वालों को भी गाँव काटता है अब। शहर वाले पागल हुए पड़े हैं उसी गाँव की सुंदरता निहारने के लिए।
पहले गाँव की गरीबी लोगों को शहर खींच लाती थी, अब की सोच, समझ, रहन सहन से लोगों को घृणा होने लगी है। नौजवानों में दारूबाजी का शौक चढ़ा है। मनरेगा में गए, काम किया, पैसा मिला और दारू चढ़ाकर बवाल काट रहे हैं। पढ़ने-लिखने से बहुत दूर होते जा रहे हैं लोग। गाँव का सबसे होनहार लड़का दिल्ली गया, साहेब बनने और अब दिल्लीवालों की मेहरबानी से सफेद बाल लेकर नौकरी के लिए थाली बजा रहा है। मतलब सरकारी नौकरी वाला मोहभंग होता जा रहा है। जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है तो खेती से खाने भर का ही बमुश्किल मयस्सर होता है। ग्रामीण युवा फिर से बड़ी मात्रा में शहरी मजदूर बन रहे हैं। कम उम्र में शादी, दहेज में दुपहिया और जोश में दू चार ठौ लइका।मर्द शहर में मजदूरी कर रहा, मेहरारू गाँव में, बच्चे मिड डे मील भरोसे। सुविधानुसार सोच तो बदल गई है लेकिन अपने मतलब के चीजों के लिए रूढ़िवादी सोच बरकरार है। औरत पर पाबंदी, लड़की पर कड़ा शासन, भूत प्रेत, जादू टोना, ऊँच नीच, अमीर गरीब के बीच वाली खाईं और भी गहरा गई है। बच्चे अब मैदानों में खेलते नहीं मिलते, किसी पुलिया पर बैठकर मोबाइल में अश्लील सिनेमा और भोजपुरी के फूहड़ गाने सुनते हुए मिलते हैं। इधर प्रेम विवाह का प्रचलन भी बहुत तेजी से चला है लेकिन उसके पीछे कोई प्रगति वादी सोच नहीं है बल्कि वह कानून है जो नाबालिग लड़की के बालात्कार की सज़ा में फांसी का प्रावधान है। जो लड़का नाबालिग लड़की के साथ पकड़ा गया, उसे डरके मारे सिंदूर पहनाना ही पड़ता है और इसी पछतावे में लड़की के ऊपर अत्याचार का एक स्थायी सिलसिला चल पड़ता है।मान-सम्मान जैसी कोई बात नहीं रह गई है। चुनाव वहाँ केवल फ्री का दारू पीने वाले मौसम की तरह आता है। फिर पाँच साल रोना-पिटना। टीवी देखकर बच्चा-बच्चा राजनीति, कूटनीति में महापंडित है। बिजली है लेकिन बस मोबाइल चार्ज करने भर की आती है। रोड़ है लेकिन हर बारिश में डूबकर टूट जाती है। जाति का ज़हर हर एक आदमी के दिमाग़ में भरा हुआ है। चौराहे शराबियों के लिए आरक्षित हो चुकें हैं। जिसके पास नौकरी है उसके जूते चाट लेंगे जो असफल होकर गाँव लौट गया उसके मुँह पर थूक देंगे। यहाँ फेसबुकियों कवियों की घनघोर काल्पनिक गाँव पर लिखी कविताएँ पढ़ता हूँ तो अपने जीवन का बीस-बाइस साल गाँव में गुजारने के बाद भी एक बारगी लगता है कि गाँव लौट जाऊँ।जब लौट जाता हूँ तो दो-चार दिन में फिर मोहभंग हो जाता है और फिर गाँव पर सुंदर सी कविता लिखने के लिए, शहर भाग आता हूँ।
पीड़ा
सूरज तप रहा है...जब मन के भीतर अंधेरा गहराया हो तो बाहर की रोशनी आँखों को चुभने लगती है। सूरज का प्रकाश उसके हृदय को कुरेदता है। आह! कितना सुंदर था वो रात का अंधकार...वो सूनापन...वो उदासी। वही अच्छी लग रही थी, अपने जैसी लग रही थी। कितना दुःख देता है...स्वयं से भिन्न कुछ देख पाना, स्वीकार कर पाना। अपने से अलग कोई किसी को कभी अच्छा लगा है भला। कितने धर्म उपजे, कितनी क्रांतियाँ हुईं, कितने नरसंहार हुए। आखिर क्यों? क्योंकि नहीं सहन कर पाए लोग अपने से अलग विचार, आचार और व्यवहार। क्या मुझे भी उस सूरज को लील लेना चाहिए, उसका अस्तित्व मिटा देना चाहिए। धकेल देना चाहिए दुनिया को उसी विशाल, अमिट और डरावनी अंधेरी खाईं में, जिसमें मैं रोज घुट रहा हूँ, मर रहा हूँ?
ध्रुव
नौवीं में मेरा दाखिला एक सरकारी कॉलेज में हो गया। सरकारी स्कूलों को लेकर उस समय लोगों के मन में उपेक्षा और डर व्याप्त थी। उसके शैक्षणिक मानक और अनुशासन को लेकर तरह-तरह की बातें होतीं रहतीं थीं। लेकिन फीस की सहूलियत और घर के करीब होने के कारण मेरे जैसे लगभग दो हज़ार बच्चे उस कॉलेज में पढ़ते थे। मेरी फीस 9 रूपये और मेरे घर से कॉलेज की दूरी लगभग 10 किलोमीटर थी। कम्प्यूटर विषय के लिए 30 रूपये अलग से शुल्क लगता था और कॉलेज जाने के लिए मुझे एक सायकिल मिल गई थी। सबके लिए एक ड्रेस कोड निर्धारित था। सप्ताह में एक दिन यानि वृहस्पतिवार को कुछ भी पहनने की छूट थी।
पहले दिन मैं,उसी कॉलेज में पढ़ने वाले अपने बड़े भाई का,ड्रेस(जोकि मेरे साइज़ से बहुत बड़ा था) पहनकर अपनी कक्षा में दाखिल हुआ। क्लासरूम एक मैंदान की तरह था क्योंकि ऊपर छत तो थी लेकिन बीच की दीवार नहीं थी। चारो ओर खुले और प्रिंसिपल अॉफिस के ठीक सामने उस कमरे की सातवीं बेंच पर झोला(तांत का, हाथ से सिला हुआ) पटककर बैठ गया। पहली घंटी गणित की थी और पहले ही दिन टेस्ट होना था। 8 सवाल, 25 मिनट और दो पेज सुपुर्द कर दिया गया। टेस्ट शुरू हुआ...ज्यादातर सवाल मुझे आते भी थे...मैं फटाफट लगाने की कोशिश कर रहा था...तभी बगल से आवाज आई-भैया आप गलत लगा रहे हैं। पलट कर देखा तो एक लड़का, जो टेस्ट पूरा कर चुका था,मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देख रहा था। खैर, मैंने गलती को सुधारा। कॉपी जमा हुई। 20 मिनट बाद रिजल्ट आ गया। मेरा नाम टॉप फाइव में था। मैंने उस लड़के नाम पूछा.. उसने कहा मैं टॉपर्स में नहीं हूँ, वैसे मेरा नाम ध्रुव है। उसको छठवां और मुझे पाँचवाँ स्थान मिला। मैंने अपने ऊपर वाले चार नामों पर गौर किया। चारो लड़कियां थीं। उसी दिन अंग्रेज़ी का भी टेस्ट हुआ और मुझे पहला स्थान मिला। इनाम स्वरूप सातवीं बेंच से पहली बेंच पर स्थाई रूप से मेरा कब्ज़ा हो गया। वो लड़का वहीं छूट गया और अंत तक मेरे पीछे ही रहा। दिनरात मेहनत करके मैंने अपने ऊपर के चारो प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। मैं आत्ममुग्धता और आत्मविश्वास से ओतप्रोत था। मुझे दिखा ही नहीं कि मेरे पीछे दूसरे नंबर पर कौन है?
खैर,बोर्ड एग्ज़ाम से पहले प्री बोर्ड हुए। मैं टॉप कर गया और लोग मुझसे बहुत पीछे छूट गए। उस समय कॉलेज में टॉप करना बड़ी बात मानी जाती थी और बोर्ड में टॉप करने वाले का नाम हमेशा के लिए एक दिवार पर छाप दिया जाता था। वहाँ पढ़ने वाले हरेक छात्र के मन में उस दिवार पर अपना नाम देखने की ख्वाहिश जरूर होती थी। मैंने भी ये ख़्वाब देखा, उसके लिए मेहनत भी बहुत की। प्री बोर्ड के बाद मैं एकदम आश्वस्त हो गया कि बोर्ड एग्ज़ाम के बाद मेरा ही नाम उस दिवार पर होगा। बोर्ड हुआ, मेरे पेपर्स भी बहुत अच्छे हुए, रिजल्ट आया और पता चला कि दिवार पर मेरा नाम नहीं होगा। मैं बहुत निराश हो गया, कुछ लोगों ने स्क्रूटनी की सलाह दी लेकिन उसके पैसे नहीं मिले। मैं खुद से बहुत नाराज हो गया। मैंने वो कॉलेज छोड़ने का निर्णय ले लिया, मुझे बर्दाश्त नहीं था उसी कॉलेज में सेकंड टॉपर बनकर पढ़ना। मैंने दूसरे कॉलेज में इंट्रेंस दिया और पास भी हो गया। स्थानांतरण प्रमाण पत्र के लिए जब पुराने कॉलेज गया तो उस दिवार पर वर्ष 2010 के टॉपर का लिखा देखा- "ध्रुव कुमार (10th B)". वही ध्रुव कुमार जो बहुत कम बोलता था, दिव्यांग था, मुझसे सवाल पूछने आया करता था, बहुत सीधा, सादा एवं मृदुभाषी था, पीछे बैठता था, किसी टीचर का चहेता नहीं था, क्लास में अक्सर लेट आया करता था, जो मेरे पीछे हमेशा नंबर दो पे था लेकिन उस समय मेरी ध्यान में नहीं था। मैं उस समय गुस्से में नहीं था, खुद से निराश भी नहीं था। मुझे ज़रा भी आभास नहीं था कि ध्रुव टॉप कर सकता है। लेकिन ध्रुव ने ही किया था, उसी का नाम लिखा था उस दिवार पे।
मैंने वो कॉलेज छोड़ दिया। उसके बाद ध्रुव से कभी मुलाकात नहीं हुई। आज सोशलमीडिया से उस समय के बहुत सारे सहपाठी संपर्क में हैं लेकिन ध्रुव यहाँ भी कहीं नहीं मिला। बाद में मैंने सुना कि उसने पढ़ाई छोड़ दी है। उसके गाँव के एक लड़के से मुलाक़ात हुई तो उसने बताया कि ध्रुव बुरे दौर से गुजर रहा है। मैंने उसका मोबाइल नंबर मांगा तो उसने कहा कि ध्रुव मोबाइल नहीं चलाता। मैंने सोचा कि अबकी गाँव जाऊँगा तो ध्रुव से जरूर मिलकर आऊँगा। लेकिन मेरे गाँव जाने से पहले ही एक ऐसी सूचना मिली जिसने मुझे झकझोर दिया। ध्रुव ने आत्महत्या कर ली। उसके पीछे क्या कारण था? उसने क्यों ऐसा किया? इतने जल्दी? कोई जवाब नहीं। बस ये सच है कि ध्रुव नहीं रहा, कहाँ गया, क्यों गया, किसे पता? आत्महत्या कायर करते हैं, जो डर गया वो मर गया, जिंदगी लड़ने का नाम है...कितने अच्छे लगते हैं ये नारे...कितनी आसानी से ऐसा बोल कर निकल जातें हैं लोग...लेकिन ये सब मरने के बाद की बातें हैं...जीने वाले को कौन बताये कि रुक जा भाई अभी मरना नहीं है।
अलविदा ध्रुव! जहाँ हो खुश रहो...वैसे भी हम सभी अपना-अपना दुःख भोगकर देर सबेर तुम्हारे ही पास आयेंगे।
~ अभिषेक सिंह
मेरी मौत पर
मैं चाहता हूँ-
मेरी मौत को तमाशा बनाया जाये
मेरी लाश को गलियों में घुमाया जाये
ढोल- नगाड़े और सितार बजायें जायें
मेरी विधवा को खूब नचाया जाये
उसकी चूड़ियाँ हथौड़े से तोड़ी जायें
नालों में रगड़कर सिंदूर छुड़ाया जाये।
लोग गालियाँ बकें मेरी करतूतों पर
थूकते जायें मेरे मरे हुए बदन पर
मुझे न दफ़नाया जाये न जलाया जाये
मेरा गोश्त जानवरों को खिलाया जाये।
मैं चाहता हूँ मेरी मौत पर कोई मातम न मनाये
मुझसे लिपटकर किसी को रोने न दिया जाये
मेरी दौलत शहर के भिखारियों में बाँट दी जाये
इसके खुशी में भूखे भेड़ियों को दावतें दी जायें।
मेरे वारिसों पर लोग रहम के पत्थर फेंकें
झूठी तस्सलियों के गट्ठर भर-भर भेजें।
मेरी तस्वीरों पर कालिख पोतकर,
उन्हें गंगा में बहा दिया जाये,
मेरे कपड़े मेरी किताबें मेरा वजूद,
चौराहे पर जला दिया जाये!
मैं चाहता हूँ मेरे मरने के बाद-
मैं कभी ज़िंदा था ऐसा कोई सबूत न छोड़ा जाये!
~ अभिषेक सिंह
Sunday, 3 May 2020
कहीं आसूँ न छलका दे ये जाम
सबकी अपनी करनी है, सबके अपने दाम।
कितनी आँखें फूटेंगी जब छलकेंगे जाम।
Tuesday, 28 April 2020
Friday, 24 April 2020
प्रयागराज में कोरोना के तीन नये मामले मिले
आभासी दुनिया में भावशून्य होता हमारा समाज
एक मित्र ने जब ये सवाल किया तो मेरे मन में हजारों विचार पनपने लगें। मैं सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ हमारे साथ जो हम इतने निष्ठुर होते जा रहे हैं। बड़ी से बड़ी घटना, दुर्घटना, पीड़ा को नज़रअंदाज़ करके जीना कैसे सीख लिया हमने। उसका उत्तर मेरी समझ से बाहर था। इसलिए मैंने तुरंत जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन ये प्रश्न मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है। गाहे बगाहे दिमाग़ में गूँजता रह रहा है। फिर मैंने बारीकी से सोचने की कोशिश की। कुछ चीजें समझ में आयी। इसके लिए मैंने कोई शोध अथवा खोजबीन नहीं की। बस मुझको जो महसूस हुआ, वही आपसे साझा कर रहा हूँ।
पहले संयुक्त परिवार हुआ करता था। महंगाई इतनी ज्यादा नहीं थी या यों कहें जरूरतें सीमित थीं। सर ढ़कने के लिए एक मिट्टी का घर, पेट भरने के लिए जो जून की रोटी, पहनने के लिए दो जोड़ी कपड़े। संसाधनों का आविष्कार इतनी मात्रा में नहीं था और उसकी पहुँच इतनी सुलभ भी नहीं थी;दूसरे हमारी महत्वाकांक्षा भी इतनी प्रबल नहीं थी। लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय था। परिवार के लोग एकसाथ खेत में काम करते, एकसाथ भोजन करते और एकसाथ आराम करते। पहले घर बहुत बड़े भी नहीं होते थे, सब के अपने अलग कमरे नहीं होतें थे, लोग एकदूसरे के बगल चारपाई डाल के सोते थे। जब लोग इतने करीब होंगे तो ज़ाहिर सी बात है कि एकदूसरे के सुखदुख से वाकिफ भी होंगे और शामिल भी होंगे। शाम को गाँव में बैठकी हुआ करती थी। सबके हालचाल, हँसी मज़ाक़ और रहन सहन से हर कोई वाकिफ़ हुआ करता था। ऐसे में लोगों की संवेदना एकदूसरे से जुड़ी हुई थी। शादी विवाह, जन्म मरण, हँसी खुशी के समारोह गाँव के हर सदस्य की भागीदारी हुआ करती थी। किसी के घर से चारपाई, कहीं से बिस्तर, कहीं से राशन, सब साथ मिलकर व्यवस्था करते और साथ मिलकर ही जश्न भी मनाते। ऐसे में हर आदमी दूसरे आदमी से जुड़ा हुआ महसूस करता और उसके दुख दर्द में पीड़ा भी महसूस करता। अब परिवार टूट गये। संसाधन बढ़ गए, मंहगाई बढ़ गई, जरूरत बढ़ गई और महत्वाकांक्षा तो आसमान छूने लगी। लोग एकदूसरे से दूर होने लगे। पलायन होने लगा। शिक्षा, रोजगार और सुख की तलाश में सब अलग अलग भटकने लगे। और जब दूरी बढ़ती तो स्वाभाविक सी बात है संवेदना घट जाती है।अब दुर्घटना होती है तो ये किसी के लिए समाचार का स्रोत है, किसी के शोध का विषय है, किसी के एजेंडे में फिट करने लायक है, किसी के मनोरंजन है।जब हम खुद को उससे जुड़े हुए महसूस ही नहीं कर पाते तो उसके लिए भाव कैसे रख सकते हैं। वैसे एक सत्य यह भी है कि घृणित आदमी बुरी ख़बर का इंतज़ार करता है, वही उसके असतित्व का साधन है।
रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल और कम्प्यूटर का आविष्कार हुआ। सबकुछ बहुत आसान हो गया। पहले रिश्तेदारों का हालचाल लेने लोग तीन तीन दिन पैदल चलकर जाते थे। जिसके यहाँ जाते थे वो पूरा घर सर पर उठा लेता था। आवभगत सीमित साधनों में पूरे भाव से किया जाता था। मेहमान और मेज़बान दोनों आभारी हो जाते थे। विदा करते समय दोनों के आँखों में आँसू भी होता था। इसके दो कारण थे एक तो पता नहीं कब अगली मुलाकात हो और दूसरा कि अगली बार मुलाकात हो कि न हो।आज के दौर में कहीं पहुँचना आसान हो चुका है। सड़कें बन गईं हैं, गाड़ियों की कमी नहीं है लेकिन अब कोई जल्दी किसी के यहाँ जाता नहीं।अब अपने घर किसी को बुलाने के लिए या तो मरना पड़ता है या फिर शादी करनी पड़ती है। क्योंकि हालचाल, सुखदुख और बातचीत सब मोबाइल, कम्प्यूटर के माध्यम से हो ही जाती है। मतलब पहले हम फिज़िकली कनेक्टेड थे, अब वर्चुअली। जब हम आमने सामने होतें हैं तो नौटंकी नहीं कर पाते, हमारे भाव असली होतें हैं और अगर नकली हुए भी तो सामने वाले की समझ में आ जातें हैं। लेकिन फोन पर नकली हँसना, रोना, झूठ बोलकर मूर्ख बनाना सब संभव है। आभासी दुनिया में मरने का विडियो देखकर आभासी पीड़ा, दुर्घटना देखकर आभासी दुख...सबकुछ झूठ और नकली। पहले तो कुछ फर्क भी पड़ता था लेकिन आए दिन वही चीज देखते देखते आदत पड़ गई है। किसी ने किसी को मार दिया, कहीं भीड़ हत्या हो गई, कहीं बालात्कार हो गया, कहीं प्राकृतिक आपदा आ गई। सबके फोटो और विडियो न्यूज़ चैनल से लेकर सोशलमीडिया तक फैलने लगते हैं। विडियो देखे, कमेंट की किए, भगवान उनकी आत्मा को शांति दें वाला पोस्ट किये, लम्बा लेख पढ़े, कुछ जुड़ने की कोशिश कर ही रहे थे कि महिला पुरुष, दलित, हिन्दू मुस्लिम वाला फैक्टर निकल कर आ गया। अब क्या?जहाँ दुख होना चाहिए था वहाँ घृणा, आरोप प्रत्यारोप और दंगा फसाद होने लगा। पूरा मुद्दा मुड़कर कहीं और चला गया। और हम धीरे धीरे खतरनाक होते गए। बिना भाव के, बिना पीड़ा के एकदम हिंसक पशुओं की तरह। हमारे समाज में रोने को मूर्खता समझा जाने लगा है, सीधा होने का मतलब बुद्धिहीन। बुद्धि के प्रकोप ने हँसने को,मारने को लड़ने को तो प्रासंगिक रहने दिया लेकिन रोने को, बचाने को और बर्दाश्त करने को कायरता की श्रेणी में डाल दिया।
~अभिषेक सिंह
Wednesday, 15 April 2020
वैश्विक महामारी में काम आयेगी एक सच्ची मुस्कान
आज हम सभी घरों में बंद हैं, बेबस हैं। अपनी इच्छाओं पर लगाम लगा रहे हैं। कुछ लोग अपने घर से दूर हैं, किसी की नौकरी खतरे में है, एक अनदेखा दुश्मन हमें चारो खाने चित्त कर दिया है। हमें नहीं पता क्या होगा, कब होगा, सबकुछ पहले जैसा होगा या नहीं, आगे सब बेहतर होगा या फिर बदतर। कई सवालों के जबाब नहीं मिल रहें हैं, पूरी मानवजाति अनिश्चितता में जी रही है। ऐसे में हमें सीखना होगा मुस्कराना। हमें अपने लोगों को यकीन दिलाना होगा कि अभी आशा है, उम्मीद कायम है। मेरी तरह निपट अकेले हैं और घबरा रहे हैं तो खुद को आइने सामने मुस्कराते हुए देखिए। झूठी नहीं, सच्ची मुस्कान। ये काम करता है। फ़िलहाल मैंने तो इसे आजमाया है। पिछले एक महीने से एकदम अकेले एक कमरे में बंद होकर जीने के लिए मैंने यही रास्ता चुना है। सोशलमीडिया पर लोगों की एक्टिविटी देखकर निराश मत होईये। अन्य महापुरुषों की तरह क्रिएटिव नहीं हैं तो भी कोई बात नहीं। फेसबुक पर डालने लायक खाना नहीं बना रहे हैं, मीम्स में हाथ तंग है, ढ़ाई बीघे की पोस्ट लिखकर ज्ञान नहीं बघारा जा रहा है, कोरोना, कोरेंटाइन, आइसोलेशन पर कविता, कहानी नहीं लिख पा रहे हैं, महान लेखकों की अद्वितीय किताबों में मन नहीं लग रहा है, नेटफ्लिक्स पर फिल्म नहीं देखा जा रहा है, कोई बात नहीं। ख़ुद को माफ़ कर दीजिए। आपसे जो हो पा रहा है, वही करिये। कोई जबरदस्ती नहीं, कोई दबाव नहीं। समाज के हिसाब से ज़िन्दगी जीते ही आयें हैं, आगे भी जीना ही पड़ेगा। लेकिन ये वक़्त सिर्फ आपका है। जो कुछ भी मन का लगे, वही करिये।शांत रहिये और हमेशा मुस्कराते रहिये।जैसा कि नक्श लायकपुरी का एक शेर है-
"ज़िन्दगी में सदा मुस्कराते रहो,
फासले कम करो दिल मिलाते रहो।"
Thursday, 9 April 2020
लॉकडाउन और गरीबी
अब बात करते हैं आज के परिपेक्ष्य में..एक तरफ वो लोग हैं जो सम्पन्न हैं, जिनकी पहुँच है, जिनके लिए कुछ भी सम्भव है। दूसरी तरफ वो लोग जो उपेक्षित, नंगे, भूखे, गरीब हैं। सक्षम लोगों का घर भरा पड़ा है, वो खुद खा रहे हैं, गरीबों को खिला रहे हैं, फोटो खिंचा रहे हैं। उनके लिए सबकुछ ठीक चल रहा है। वंचित लोग पैसे की कमी से जूझ रहे हैं, जो जून की रोटी के लिए तिकड़म कर रहे हैं। गलती कर रहे हैं, गालियाँ सुन रहे हैं। बच्चों का पेट भर जाये इसलिए बाप भूखा सो रहा है, गली के कुत्ते भूखे मर रहे हैं। ये स्थिति ज्यादा दिन तक रही तो ये भी नौबत आ सकती है कि कोई किसी को मारकर अपना पेट भरे। वह समाज की नज़र में दानव होगा, दुनिया कोसेगी उसे। लेकिन आज तमाम चीजों से अपना घर भरते वक़्त क्या आपको तनिक भी ख़्याल आ रहा होगा कि कोई खाली हाथ लौट गया होगा दुकान से, कीमत बढ़ रही है, सबके बस की बात नहीं है कि वो खरीद सके अपनी जरूरत भर की ही वस्तुएँ..!! मनुष्य का स्वभाव है संहार...नकाबों में ये स्वभाव छिप जाता है मगर नकाब उतरा तो कई लोग उतर जायेंगे बहुत नीचे फिर देते रहियेगा दुहाई मानवता की..!!
Friday, 3 April 2020
Modi's video Message to People
- Today, Prime minister Narendra Modi issued a video message.He said that we should be United as a nation in the fight against coronavirus pandemic. Prime minister said, "On April 5, I urge all of you to stand on your doorway or balconies and for nine minutes light a candle, diya, torch or your mobiles with an aim to fight the darkness spread by coronavirus with light.If everyone lights one diya each,then we will realise the power of that light. We will be able to highlight the objective for which we all are fighting together.I have one request. During this event, no one is supposed to gather. No one should assemble on roads or their colonies. This task needs to be completed from balconies and doorways of your homes.The country-wide lockdown completed nine days today. During this time, the way you people have set an example of discipline and service was unprecedented.Do not cross Lakshman Rekha of social distancing. Social distancing is not to be broken under any circumstances. This is the panacea for breaking the corona chain.The way all of you on March 22 thanked everyone fighting against coronavirus was appreciated across the world. Countries around the world are adopting the concept.When millions of people are enclosed inside their homes, there must be some who must be asking how can they alone fight this battle against Covid-19.We are not alone. This is the power of 130 crore people.This awareness gives us motivation, gives us a goal and gives us the energy to achieve them, it further clears our path.Fiends, amidst this darkness caused by coronavirus epidemic, we need to constantly pursue to reach towards the light."
Friday, 27 March 2020
महामारी में मुफ़्तखोरी
Thursday, 26 March 2020
वायरस के अंधकार में भविष्य पर प्रकाश
Tuesday, 24 March 2020
कोरोना वायरस को रोकने के लिए 21 दिनों तक भारत बंद
Monday, 23 March 2020
दौर-ए-महामारी
कोरोना के चलते देश के 75 जिलों में लॉकडाउन
Saturday, 21 March 2020
भारत में कोरोना वायरस और जनता कर्फ़्यू
भारत एक विकासशील देश है। यहाँ अभी भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा के क्षेत्र में हम दुनिया के तमाम देशों से बहुत पीछे हैं। भ्रष्टाचार और इच्छाशक्ति की कमी के कारण सरकार और जनता के बीच अविश्वास पैदा हुआ है। बेरोजगारी और साम्प्रदायिकता ने लोगों में आक्रोश पैदा किया है। वैश्वीकरण और उदारवाद ने देश में मध्यमवर्ग को बढ़ाने का काम तो किया लेकिन इसी के साथ रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी समाज का भी उद्भव हुआ। सरकारी एजेंसियों के आँकड़ों और वैश्विक संस्थाओं के आँकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई पड़ता है। देश की साक्षरता और सोशलमीडिया की सक्रियता के कारण आम जनता तक दोनों आँकड़े आसानी से पहुँच जाते हैं। उन आँकड़ों पर बहस और अफ़वाहों के चलते भी लोगों में अविश्वास पैदा हुआ है। मतलब ये है कि सरकार और जनता के बीच एक गहरी खाईं पनप रही है। ऐसे दौर में किसी वैश्विक महामारी की चपेट में आना देश के लिए चुनौतिपूर्ण है।
चीन के वुहान शहर के हुबेई प्रांत से शुरू हुआ कोराना वायरस आज दुनिया के लगभग १८६ देशों तक पहुँच चुका है। विकसित देशों में शुमार यूरोपियन और अमेरिकन कन्ट्रीज़ में भी इस वायरस ने तबाही मचा रखी है। दुनिया के तमाम देश,जो अपने अस्पताल, विज्ञान , सुविधा, सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए जाने जाते थे, इस महामारी के आगे बेबस दिख रहे हैं। सबसे बड़ी वैश्विक महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग स्वास्थ्य बीमा के अभाव में जी रहे हैं और इलाज के लिए पैसे नहीं जुटा पा रहे हैं। इटली में ऐसी स्थिति है कि बुजुर्गों को मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है, केवल युवाओं को ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा पहुँच पा रही है। सभी देशों ने अपनी सीमायें बंद कर रखी हैं। अनेकों आयोजनों को स्थगित किया जा चुका है। जापान में होने वाले समर ओलंपिक पर भी खतरा मंडरा रहा है। शेयर बाजार धड़ाम से गिर गया है। कच्चे तेलों के दामों में अभूतपूर्व कमी आई है। अभी तक इस वायरस का कोई टीका नहीं खोजा गया है। कोरोना वायरस का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है और पूरी मानव जाति इसके सामने बेबस नज़र आ रही है। लोग अपने घरों में बंद हैं। व्यापार ठप्प होते जा रहे हैं। दुनिया जैसे थमती जा रही है।
इन देशों के मुकाबले भारत की जनसंख्या बहुत बड़ी है और सुविधाएं बहुत कम। हमारी भौगोलिक स्थिति भी इनसे भिन्न है। हमारी संस्कृति, सभ्यता, रीति रिवाज और रहन सहन भी इनसे भिन्न है। विविधताओं से भरे इस देश में कोरोना ने दस्तक दे दी है। अब सरकार, बुद्धिजीवी वर्ग, व्यापारी वर्ग और सोशलमीडिया के महारथियों को चेत जाना चाहिए। मज़ाक, लापरवाही और गलती की गुंजाइश नहीं बची है। सभी को एकसाथ मिलकर इस महामारी का सामना करना चाहिए। देश में कोरोना अभी दूसरे स्टेज में है, तीसरे स्टेज में पहुँचने से पहले हमें इसे रोकना होगा। हमारे पास अस्पताल और कुशल चिकित्सकों की भारी कमी है। ऐसे में एक ही उपाय है-बचाव। लोगों को जागरूक करके इस बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। जनता कर्फ्यू का ऐलान एक सार्थक पहल है। हम सभी को उसपर अमल करना चाहिए। शहरों में बिमारी तेजी से फैल रही है। इसके कारण तमाम पढ़ी लिखी और जागरूक जमात गाँवों की ओर पलायन कर रही है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का और भी अभाव है। ऐसे में गाँवों को लौटे शिक्षित लोगों का कर्तव्य है कि वो अपने आसपास के लोगों को जागरूक करें। उन्हें इस महामारी के बारे में बताएं। नौजवान टुकड़ी बनाकर लोगों को सफाई करने के लिए प्रेरित करें। उन्हें ज्यादा से ज्यादा घर में रहने की सलाह दें। बुजुर्गों और बच्चों की विशेष देखभाल के लिए आग्रह करें। लोगों के अंदर डर और भ्रम न पनपने दें। उन्हें समझाएँ कि बचाव ही एकमात्र उपाय है। खुद को भी सुरक्षित रखें। लम्बी यात्रा करके गाँव पहुँचने वाले लोग कुछ दिन घर में ही रहें। जुकाम, बुखार की स्थिति में भीड़भाड़ वाली जगहों में जाने से बचें। अगर शहर में ही रहकर सुरक्षित रहना सम्भव हो तो कुछ दिन गाँव न ही जायें। भारत गाँवों में बसता है। गाँवों को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। वहाँ केवल बचने या फिर बीमारी फैलाने न जाएँ। गाँवों को भी आपकी जरूरत है। छोटे छोटे प्रयास करके गाँवों को इस बीमारी से बचाने में सहयोग करें। यह डरने या संदेह करने का समय नहीं है। एकजुट प्रयास करें, एक दूसरे का सहयोग करें। हमने तमाम चुनौतियों का सामना किया है। हमने मानवता के बल पर कई लड़ाईयां फ़तेह की हैं। हम कोरोना को भी हरा देंगे। बस सतर्क रहें, सहयोग करें और सुरक्षित रहें।
~अभिषेक सिंह
जनता कर्फ्यू के पहले तैयार दिखे आम लोग
Friday, 20 March 2020
निर्भया कांड के दोषियों को फांसी
Wednesday, 26 February 2020
दिल्ली में दंगा और झूठों की दादागिरी
कहीं आगजनी होती है,राह चलती किसी महिला का रेप हो जाता है,कहीं पत्थर फेंके जाते हैं,कहीं भीड़ मिलकर किसी की हत्या कर देती है,कोई लुट जाता है, कोई लूट लेता है।
ये सारी घटनाएं होती हैं तो सोशलमीडिया पर दो गुट सक्रिय हो जाते हैं।जिनका इन घटनाओं से न कोई सम्बन्ध होता है और न ही कोई सगा सम्बन्धी भुक्तभोगी।ये तथाकथित बिमार मानसिकता वाले स्वयंभू बुद्धिजीवी जमात खोजने बैठ जाती है भड़काने वाले फोटोज़ और विडियोज़।कैप्शन ऐसा कि पढ़ने और देखने वाले का खून खौल जाये।उसके अंदर के जानवर को जगाकर इंसान को सुला देते हैं ये भेड़िये।बुद्धि का सर्वाधिक दुरूपयोग ऐसे ही समय में किया जाता है।जनता के हाथ में सबकुछ देने का नुकसान यही है कि जिम्मेदारी के अलावा उसे सबकुछ अच्छा लगता है।
ऐसे वक़्त में आपके पास भी तमाम प्रकार के फोटोज़ और विडियोज़ आयेंगे।आपको सतर्क रहना होगा....आपके सगे मित्र भी वही सब शेयर करेंगे....अपने धर्म, विचारधारा और समाज को फ़ायदा पहुँचाने वाला मैटेरियल से भर देंगे पूरा टाइमलाइन....आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों कर रहे हो भाई....ये गलत विडियो है, ये गलत आँकड़ा है, ये गलत खबर है.....वो आपकी बात नहीं मानेंगे, वो आपकी मित्रता का लिहाज़ नहीं करेंगे... वो अपनी बुद्धि का प्रयोग करेंगे... अपने किए को सही साबित करेंगे और अपने अनुयायियों के बीच में छा जायेंगे....आभासी दुनिया में वास्तविक मूर्खता कर देते हैं लोग दिखावे के चक्कर में..!!
यह सब एक खेल है....लगातार खेला जा रहा है और आप मजे से तालियाँ बजा रहे हैं...तालियों के बीच में कुछ छूट जा रहा है...कुछ सुन नहीं पा रहे हैं आप...थोड़ा रूकिए, ध्यान लगाकर सुनिए....किसकी सिसकी सुनाई पड़ेगी, कोई दर्द से कराह रहा होगा, कोई जान बचाकर भाग रहा होगा....किसी की जीवन भर की कमाई लगाकर खरीदी गई गाड़ी जल रही होगी....!!
अगर ये सब नहीं सुनना चाहते हैं तो शौक से शेयर करिये...पुलिस द्वारा पत्थर बिनवाते विडियोज़, टोपी वाले के हाथ में बम वाले फोटोज़, भगवा वाले के हाथ बंदूक वाले मीम्स...आप सामाजिक आदमी हैं और घृणा फैसला आपका सामाजिक कर्तव्य..!!
Sunday, 9 February 2020
भारत को हराकर चैम्पियन बना बांग्लादेश
टॉस जीतकर बांग्लादेश ने पहले गेदबाजी करने का फैसला किया। भारतीय टीम की शुरुआत अच्छी रही लेकिन विकेटों के लगातार पतन के कारण बड़ा स्कोर बनाने में नाकामयाब रही।भारत का स्कोर एक समय 39 ओवर में तीन विकेट पर 156 रन था। ऐसा लग रहा था कि बल्लेबाजी के लिए मुश्किल विकेट पर भी टीम इंडिया 230-240 रन आसानी से बना लेगी। लेकिन उसी दौरान 88 रन बनाकर खेल रहे सेट बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल को शौरीफुल इस्लाम ने आउट कर दिया। शॉर्ट पिच गेंद पर बड़ा शॉट खेलने के चक्कर में यशस्वी ने तनजीद हसन को आसान कैच थमा दिया। इसके बाद कोई भी भारतीय बल्लेबाज विकेट पर ज्यादा देर टिक नहीं पाया और भारतीय टीम 177 रन बनाकर आल आउट हो गई।बांग्लादेश की तरफ से अविषेक दास ने सर्वाधिक तीन विकेट चटकाए।
लक्ष्य का पीछा करने उतरी बांग्लादेश टीम की शुरुआत अच्छी रही। उसने 50 रन बिना किसी विकेट के नुकसान पर बना लिए थे। उसी दौरान भारतीय कप्तान प्रियम गर्ग ने गेंद स्पिनर गेंदबाज रवि विश्नोई के हाथों में दी। विश्नोई ने शानदार गेंदबाजी करते हुए बांग्लादेश के चार बल्लेबाजों को पवेलियन की राह दिखाई। एक समय पर बांग्लादेश के 85 रन पर पाँच विकेट गिर चुके थे और वह मुश्किल में दिखाई पड़ रही थी। लेकिन कप्तान अकबर अली के नाबाद 43 रन ने भारतीय टीम के मंसूबे पर पानी फेर दिया। बांग्लादेश की तरफ से ओपनर बल्लेबाज परवेज़ हुसैन ने भी 47 रन की शानदार पारी खेली।
बांग्लादेश की पारी के बीच में ही बारिश आ गई। जिसकी वजह से उसे डकवर्थ लुईस नियम के आधार पर 46 ओवर में 170 रन का संशोधित लक्ष्य मिला। बांग्लादेश की टीम ने 42.1 ओवर में सात विकेट खोकर लक्ष्य को हासिल कर लिया और विश्व चैंपियन का ताज पहना।
Sunday, 26 January 2020
गणतंत्र दिवस
भारत अपना ७१वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार है कि संविधान की दुहाई देकर और संविधान की आड़ में ही देश कई हिस्सों में बँटा हुआ है। संविधान की शपथ लेने वालों, संविधान की रक्षा करने वालों और संविधान के अनुसार चलने वालों के बीच एक गहरी खाईं पनप रही है। ये कहना मुश्किल है कि कौन संवैधानिक बात कर रहा है और कौन संविधान का ग़लत फ़ायदा उठा रहा है। केंद्र सरकार ने संविधान का सहारा लेकर नागरिकता संसोधन कानून बनाया, कई राज्य सरकारें संविधान के अनुच्छेद १३१ के तहत उच्चतम न्यायालय की शरण में गईं और कुछ लोग इस कानून को संविधान के अनुच्छेद १४ का हनन मानते हुए, इसका विरोध कर रहे हैं। अब ये सारे लोगों की गाड़ी संविधान के सहारे ही चल रही है। लेकिन क्या यह संभव है कि एक ही मुद्दे पर सभी लोग संविधान के अनुसार सही भी हों और सभी में मतभेद भी हो। दर'असल इसका जवाब तो केवल उच्चतम न्यायालय ही दे सकती है। तमाम याचिकाओं के आलोक में उच्चतम न्यायालय ने फ़िलहाल हिंसा और गतिरोध के चलते तुरंत सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। यहाँ एक चीज़ और ध्यान देने योग्य है कि सरकार का धर्म है, जनता के हितों की रक्षा करते हुए, देश का विकास करना लेकिन सरकार ने जनता को विश्वास में लिए बिना ही संसद से ये कानून पारित कर दिया और जनता का काम है कि संविधान के अनुसार अपने अधिकारों को प्राप्त करना लेकिन वही जनता उच्चतम न्यायालय के फैसले का इंतज़ार करने की बजाय खुद निर्णय ले ली कि कानून संवैधानिक नहीं है और सड़कों पर उतर आई। मतलब यह साफ़ है कि सब अपने कर्तव्य से विमुख हैं।
ऐसे मौकों पर राजनीतिक दलों की भूमिका बढ़ जाती है। उन्हें आपसी बातचीत और सहयोग के माध्यम से जनता को समझाना चाहिए। लेकिन अभी ऐसा होता नहीं दिख रहा है। सबको अपना-अपना हित साधना है। मामले को सुलझाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है क्योंकि मामले को सुलगाने में ही सबका फ़ायदा है। इसमें बस नुकसान है तो देश की अस्मिता और एकता को। संविधान सभा में कोई भी प्रस्ताव बहुमत से नहीं बल्कि एकमत से पारित होता था। सभी प्रस्तावों के लिए सभी सदस्यों का राज़ी होना जरूरी होता था। संविधान सभा में विभिन्न मत, समुदाय, धर्म, जाति, समुदाय के लोग थे। उनमें वैचारिक एवं सामाजिक मतभेद भी होता था। लेकिन देशहित में, सभी देशवासियों के हित में सभी लोग एकसाथ, एकमत हो जाते थे। आज जितनी भी राजनैतिक पार्टियाँ इनके नामों पर अपनी गाड़ी चला रहीं हैं, उन्हें इनके आदर्शों से इतना तो सीखना ही चाहिए कि कभी-कभी देशहित में स्वयं के हित को किनारे रखकर सुलह की पहल करनी चाहिए। आज की स्थिति को देखते हुए ऐसा होना संभव नहीं लग रहा है। भारतीय राजनीति का नैतिक पतन अपने चरमोत्कर्ष पर है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसा होना चिंतनीय है। सरकार को जनता के हितों की रक्षा करनी चाहिए और जनता को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यही एक परिपक्व लोकतंत्र की विशेषता है। अपने राजनैतिक और व्यक्तिगत हितों के लिए राष्ट्रीय मूल्यों की अनदेखी करना कतई उचित नहीं है। आज देश के झंडे को फहराने वालों और संविधान की कसम खाने वालों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है। गणतंत्र दिवस पर अपने संविधान के लिए हमें इतना तो करना ही चाहिए।
" जय हिंद "
~अभिषेक सिंह
Friday, 24 January 2020
सोशलमीडिया की नेतागिरी
Tuesday, 21 January 2020
विरोध, आंदोलन और हिंसा
भारत विविधताओं से भरा देश है।हलांकि विविधताएँ केवल अकेले भारत के हिस्से में नहीं आयीं।दुनिया के ज्यादातर बड़े देशों में यह आसानी से मिल जाती है।लेकिन उनमें से बहुत सारे देशों ने बहुसंख्यकों के हिसाब से अपने को ढ़ाल लिया।भारत ने विविधता का सम्मान किया और सभी के लिए समान व्यहार करने की संकल्पना की। यही कारण था कि ज्यादातर पश्चिमी विद्वानों ने भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की उम्र बहुत कम बताई थी।क्योंकि यह उस समय के हिसाब से बहुत ज्यादा आदर्श और ढेर सारी मान्यताओं को तोड़ने वाला लोकतंत्र बन गया था।गाँधी ने नेहरू पर भरोसा जताया और नेहरू इसपर लगभग खरे उतरे। उन्होंने सभी को स्वीकारा, सभी को अधिकार देने की वकालत की और सभी के प्रतिनिधित्व का सम्मान किया। यही विविधता और यही पहचान भारत के लिए समय-समय पर चुनौती बनती रही है। शुरुआत के कुछ सालों तक आज़ादी का नशा था तो वामपंथी और समाजवादी विचारधाराओं की गरीब, अमीर, अगड़ों, पिछड़ो, ऊँच, नीच वाली थ्योरी को लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उस समय धर्म से ज्यादा प्राथमिकता सबको बराबर-बराबर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दर्जा देने की बात को दी गई। कांग्रेस सत्ता में थी और लगभग सभी विपक्षी दल इन्हीं बातों पर उसे घेरते थे। हलांकि यह एक राजनैतिक एजेंडा था इसलिए आंशिक परिवर्तन तो आया मगर इन सबके बीच की खाई और गहराती चली गई। मेरा मानना है कि सबको बराबरी देने का मापदंड गलत था, जिस प्रकार से बराबरी देने की बात की जा रही। दर'असल वह बिल्कुल गलत दिशा थी। आप जब किसी का अवसर, किसी का संसाधन, किसी की मेरिट को छीन कर किसी और को न्याय देने की बात करेंगे तो असंतोष के साथ-साथ दुर्भावना भी फैलेगी। यही वज़ह है कि भारत में जाति वैमनष्यता लगातार बढ़ती जा रही है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। सरकारों को इसके उन्मूलन को बढ़ावा देना चाहिए था लेकिन राजनीतिक फ़ायदा उठाने के लिए ये गलतियां लगातार सभी दल कर रहे हैं। सभी को समानता देने की बात करना बहुत बड़ी चुनौती है और सभी क्षेत्रों में देने की सोचना लगभग मूर्खता।हलांकि भारत ने लगातार इस दिशा में काम किया है परन्तु नेताओं की इच्छाशक्ति में कमी और मौकापरस्ती की वज़ह से यह सम्भव नहीं हो सका है।अस्सी के दशक में वोट बैंक की राजनीति शुरू हुई और साम्प्रदायिक ताकतों को मजबूती मिली। देश के सामने अपनी पंथनिरपेक्षता को बचाना बहुत बड़ी चुनौती हो गई।
जैसे-जैसे साम्प्रदायिकता को बल मिला देश गाँधी की विचारधारा से दूर होता गया।पहले के आंदोलनों में गाँधी मॉडल अपनाया जाता था जो लम्बा लेकिन पूर्णतः अहिंसक हुआ करता था।बाद में देशवासियों का असंतोष बढ़ता गया। सरकारों के वादाखिलाफी, बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण लोगों के अंदर निराशा के साथ-साथ आक्रोश भी बढ़ता गया। राज्य जब अपना धर्म अच्छे से नहीं निभा पाता तो जनता के अराजक होने के चांसेस बढ़ जाते हैं। अब विरोध का स्वरूप बदल गया है। लोगों के अंदर एक जल्दबाज़ी बरपी रहती है। इंतज़ार करना बेवकूफी कही जाती है। इसके पीछे एक तो आधुनिक जीवनशैली जिम्मेदार है, दूसरे अब लोगों को हुक्मरानों पर इतना भरोसा भी नहीं है कि वे शांति से कही गई बात को आसानी से मान जायेंगे। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। हमेशा से इतिहास इसे दोहरता रहा है। जर्मनी, रूस, इरान, चीन जैसे देश इसके सटीक उदाहरण हैं। उदारीकरण और भूमंडलीकरण से लोगों की उम्मीद बढ़ी थी। पूरी दुनिया में तेजी से विकास हुए। तकनीक ने ऊँचाइयाँ छूईं। तमाम देश एकसाथ मिलकर आगे बढ़ने लगे। लेकिन अब, इतने सालों के बात लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस चीन को यूरोप और अमेरिका के पैसे मिले, वही अब उनके सर पर चढ़ रहा है। ऐसे ही विकसित देशों ने विकासशील देशों के साथ किया। शहरों ने गाँवों के साथ किया। गरीब और गरीब होता गया,अमीर और अमीर होता गया। कुछ नहीं बदला, बस खिलाड़ी बदल गए, खेल बदल गया, परिणाम वही रहा। जैसे-जैसे ये हालात बढ़ते जायेंगे। लोगों का सब्र टूटता जायेगा। सड़कों पर हथियारों के साथ उतरती हुई भीड़ को काबू करना बहुत बड़ी चुनौती बन जायेगी। हिंसा अब परिवर्तन के लिए जरूरी बताई जायेगी। हिटलरों की संख्या बढ़ती जायेगी। युद्धों का इतिहास पढ़ने वाली पीढ़ियों को अब अपना इतिहास बनाने का शौक चढ़ा है। अब हर 2 अक्टूबर को गोडसे टॉप पर ट्रेंड करता रहेगा।
~अभिषेक सिंह
Wednesday, 14 August 2019
कश्मीर पर गंदगी
इमरान के बयान का मतलब
बाकी देश की आज़ादी के दिन का जश्न मनाईये और याद करने की कोशिश करिये कि वास्तव में गुलामी कितनी खतरनाक और दुःखदाई होती है... गुलाम कश्मीर को आज़ाद भारत बनने दीजिये.... विचार बदल सकते हैं... इतिहास नहीं..!!
!!!! जय हिंद!!!
Monday, 22 July 2019
चंद्रयान 2
किस्सों,कहानियों,कविताओं,शायरियों एवं हिंदी फिल्मों में जो काल्पनिक चांद बेहद खूबसूरत एवं सुदूर माना जाता था,20 जुलाई 1969 को मानव ने उस पर अपना पहला कदम रख दिया।उस सुंदर और मनोहर चांद से मानव की पहली मुलाकात ने कई मिथक तोड़े।न वहां जीवन है और न ही होने की बहुत संभावनाएं।वह खूबसूरत चाँद मनुष्य की करतूतों से वाकिफ था शायद,उसने देखा होगा धरती पर हमारे विनाशकारी कारनामों को,वह सतर्क था कि हम खतरनाक लोगों के लिए वो धरती की तरह अपना सत्यानाश नहीं करायेगा।पिछले 50 सालों से चांद और आदमी के बीच एक गोरिल्ला युद्ध चल रहा है,आदमी वहां जीवन की संभावनाएं खोज रहा है और वह उन संभावनाओं को खत्म करने की कोशिश में लगा है।इसमें कौन जीतेगा यह तो नहीं कहा जा सकता परंतु इतना जरूर है कि मनुष्य एक ऐसा जीव है जो अपने बनाने वाले को भी चुनौती देकर उसे अपनी गलती का एहसास करा ही देता है तो चाँद उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है।40 के दशक में अमेरिका ने चाँद को रॉकेट से उड़ाने की योजना भी बनाई थी।
खैर,आज से 50 वर्ष पहले चंद्रमा पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति नील आर्मस्ट्रांग ने कहा था, "मानव का यह छोटा-सा कदम,मानवता के लिए बहुत ऊंची छलांग है।"16 जुलाई 1969 को अमेरिकी अंतरिक्ष यान अपोलो11,नासा के द्वारा,चाँद की ओर रवाना किया गया।इसमें तीन अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग,एडविन एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस थे।चंद्रयान 'ईगल' परिक्रमा यान 'कोलंबिया' से चांद की सतह पर पहुंचने से पहले अलग कर दिया गया।'ईगल' में नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन बैठे थे। 'कोलंबिया',जो कि चंद्रमा की सतह से 96 किलोमीटर दूर परिक्रमा कर रहा था,की जिम्मेदारी माइकल कॉलिंस को सौंपी गई थी।इस प्रकार 20 जुलाई 1969 को कल्पना के सुंदर चांद पर मानव ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।यह ऐतिहासिक उपलब्धि मानव सभ्यता के लिए बहुत बड़ी बात थी।अपोलो11अभियान में अब तक के सबसे बड़े और ताकतवर रॉकेट,सैटर्न-वी का इस्तेमाल हुआ था।अमेरिका ने 'अपोलो' मिशन 1960 से ही शुरू कर दिया था।अपोलो1से लेकरअपोलो10 तक के अभियान में चन्द्रमा से जुड़ी तमाम रोचक जानकारियों को इकट्ठा किया गया था।इसके बाद अपोलो 11,12,14,15,16 एवं 17 के द्वारा छः अंतरिक्ष यात्री चाँद तक पहुंचने में सफल हुए।अपोलो13 को तकनीकी खराबी आ जाने के चलते चन्द्रमा की सतह पर उतारा नहीं जा सका।20 अप्रैल 1972 का अपोलो17 अभियान चांद पर मानव भेजने का आखिरी अमेरिकी अभियान था।उसके बाद कोई भी मनुष्य चांद की सतह तक नहीं पहुंच सका है।इसके पीछे कई तर्क दिए जाते हैं- एक तो चंद्रमा पर मानव भेजने के अभियान में खर्च बहुत ज्यादा आता है,दूसरे इसका बहुत अधिक वैज्ञानिक लाभ भी नहीं है,तीसरा इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी सख्त जरूरत होती है।भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो,2022 तक चंद्रमा पर मानव भेजने की तैयारी में लगी हुई है।
चंद्रमा पर मानव भेजने में सफलता भले ही अमेरिका को मिली हो परंतु वहां अपने कई यान सोवियत संघ ने भी उसी दौरान भेजे।अमेरिका के अपोलो मिशन की तरह ही सोवियत संघ ने भी 'लूना' मिशन के तहत चंद्रयान भेजकर चंद्रमा के बारे में जानकारियां प्राप्त की।उसने 1959 में अपना पहला चंद्रयान लूना1 छोड़ा,फिर लूना 2,लूना3 चंद्रमा के अंधेरे भाग की तस्वीर निकालने वाला पहला चंद्रयान था।1966 में छोड़े गए,लूना9,अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर उतरकर दूरदर्शी के माध्यम से फोटो खींचे जो इतने करीब से चन्द्रमा की तस्वीरें लेने वाला पहला चंद्रयान था।1970 में भेजा गया,लूना16 चंद्रमा की मिट्टी के नमूने को धरती पर लाया।इस प्रकार सोवियत संघ ने लूना1 से लेकर लूना21 के तक के चंद्रयानों के माध्यम से चंद्रमा के बारे में अनेक जानकारियां प्राप्त की।जब अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग एवं एडविन एल्ड्रिन चाँद की सतह पर पहुँच कर इतिहास रच रहे थे,उसी समय सोवियत संघ का मानवरहित चंद्रयान लूना15, चन्द्रमा की सतह से 530 मील दूर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
22 अक्टूबर 2008 को भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी 'इसरो' ने अपने पहले ही प्रयास में मानवरहित अंतरिक्षयान चंद्रयान1 को चंद्रमा तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की।इसके साथ ही भारत अमेरिका,रूस,चीन और जापान के साथ चंद्रमा पर अंतरिक्षयान भेजने वालों की सूची में शामिल हो गया था।इसरो,इस अंतरिक्षयान को भेजने में खर्च एवं समय के मामले में सबसे अव्वल एजेंसी रही।चंद्रयान1में लगे अधिकतर उपकरण अमेरिकी स्पेस एजेंसी 'नासा' के थे।जिसके कारण चंद्रयान1 द्वारा जुटाए गए तमाम आंकड़ों को NASA से साझा करना पड़ा।जिनका अध्ययन एवं विश्लेषण करके श्रेय नासा ने ले लिया,जैसे-चंद्रमा पर पानी की पुष्टि भारतीय चंद्रयान1 ने की थी परंतु इसके आंकड़ों का विश्लेषण करके घोषणा करने का सौभाग्य नासा को मिल गया।आज,22 जुलाई 2019 को इसरो ने अपने दूसरे अंतरिक्षयान,चंद्रयान2 को चांद पर भेजा है।चंद्रयान2 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें उपयोग किए गए ज्यादातर उपकरण इसरो ने ही बनाए हैं।अतः इसके द्वारा दिए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने का मौका भी इसरो को ही मिलेगा।यह कदम भारत के 2022 तक चंद्रमा पर मानव भेजने के कार्यक्रम को एक नई दिशा प्रदान करेगा।
अब जबकि चंद्रमा के बारे में हमारे कई मिथक टूट चुके हैं।कवियों एवं शायरों के महबूब की तरह चाँद बहुत खूबसूरत तो नहीं है।लेकिन फिर भी चंद्रमा की अहमियत हम धरती पर रहने वाले प्राणियों के लिए आज भी बहुत है।क्योंकि अगर चंद्रमा न हो तो हमारे यहां दिन केवल 6 घंटे का ही होगा,चाँदनी रात का शीतल प्रकाश, ज्वार-भाटा का जिम्मेदार,चाँद आज भी शायरों का सबसे हसीन महबूब है।
'चलो मान लिया कि चाँद में दाग है,
मगर उसके होने से ही चाँदनी रात है!'
~अभिषेक सिंह
Saturday, 20 July 2019
अलविदा शीला दीक्षित
शीला दीक्षित की राजनीतिक पारी पारी की शुरुआत 1984 में हुई जब राजीव गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में लिया। राजनीति में आना उनके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि उनके पति विनोद दीक्षित के पिता उमाशंकर दीक्षित कांग्रेश के पुराने सिपाही थे एवं इंदिरा गांधी सरकार में गृहमंत्री मंत्री भी रह चुके थे।सन 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में शीला दीक्षित कन्नौज से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बनीं।राजीव गांधी सरकार में वह संसदीय कार्य राज्यमंत्री रहीं एवं संयुक्त राष्ट्र आयोग में महिलाओं की स्थिति पर भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।सन 1998 में सोनिया गांधी ने उन्हें दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया, उसी दौरान दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में, कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज की अगुवाई वाली भाजपा को मात दे दी और शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री बनाया गया।अपने कार्यकाल में उन्होंने कुछ सराहनीय कार्य किए हैं, जिसके लिए दिल्ली की जनता को उनका स्मरण होता रहेगा दिल्ली में मेट्रो लाना कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन अवैध कब्जे हटाकर ट्रेन की पटरी आना कॉलेज की लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन बांटना सीएनजी लाना उनके ऐसे काम है जिनका जनता पर सीधे तौर पर पड़ा शीला दीक्षित 15 सालों तक 15 साल 1998 से 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री बनी रही इस दौरान उनकी उपलब्धियों के साथ साथ उन पर आरोप भी लगे जो राजनीति में कोई नई बात नहीं है 2013 में हुए निर्भया कांड कामनवेल्थ गेम्स में घोटाले का आरोप अन्ना हजारे के आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल समूह का कांग्रेस पर घोटाले के आरोप दिल्ली की जनता का एकरूपता से उठ जाना एवं 15 सालों तक राज करने के बाद आत्मविश्वास अति आत्मविश्वास होने के कारण 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी एवं शीला दीक्षित दोनों को हार का सामना करना पड़ा।उसके बाद शीलाजी को कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया,परंतु उन्होंने कुछ महीने बाद ही इस्तीफा दे दिया।2017 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित को पहले तो मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया गया परंतु बाद में हटा दिया गया।फिर दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया,परंतु 2019 के आम चुनाव में पूर्वी दिल्ली से उन्हें भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा।जिसके बाद दिल्ली कांग्रेस के नेताओं में गुटबाजी होने लगी थी।अभी एक हफ्ते पहले ही दिल्ली कांग्रेस प्रभारी पीसी चीको और शीला दीक्षित के बीच विवाद गहराया था,जब पीसी चीको ने शीला दीक्षित की खराब तबीयत का हवाला देते हुए उन्हें आराम करने की नसीहत दे डाली थी।और इसके जवाब में शीला दीक्षित ने चीको द्वारा बनाए गए कार्यकारी अध्यक्षों के अधिकार कम कर दिए थे। जिससे दिल्ली कांग्रेस में गुटबाजी हो गई थी।
राजनीति में जो व्यक्ति 35 वर्ष की लंबी पारी खेला हो,और देश की राजधानी में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री के पद पर रहा हो,उस पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तो स्वाभाविक ही हैं परंतु शीला दीक्षित जैसी सशक्त महिला राजनेत्री भारतीय आवाम के दिलों में हमेशा उपस्थित रहेंगी।आज समाज जब स्त्रियों के प्रतिनिधित्व एवं उनके प्रशासन कुशलता की तह में जाने का प्रयास कर रहा है तब शीला दीक्षित जैसी महिला हमेशा मिसाल के तौर पर पेश की जाएंगी।एक राजनीतिक शक्सियत होने के बाद भी सबसे मृदुभाषी एवं मिलनसार रवैया अपनाने की कला भारतीय राजनीति के नए नेताओं को इनसे सीखने की जरूरत है।मनुष्य की शरीर नश्वर एवं कर्म अमर हैं। आपका शरीर पार्थिव हो गया है परन्तु आपके योगदान अमर रहेंगे।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें!


