Sunday, 3 May 2020

कहीं आसूँ न छलका दे ये जाम

शराब की दुकानें खुलने जा रहीं हैं। जोक्स बनेंगे, मीम्स बनेंगे, फनी विडियोज़ वायरल होंगे। देश की अर्थव्यवस्था खराब दौर में है। उसे हो सकता है इस कदम से कुछ मदद भी मिलें। वैसे भी मंदी के दौर में भी लोग शराब खरीद रहे थे, दोगुनी कीमत पर। अब शायद खुलने के बाद भी इनके दामों में कुछ बढ़ोत्तरी हो। गाँव में गरीब और मजदूर तबके को सरकार ने आर्थिक सहायता दी है, खाने को राशन दिया है, सिलेंडर दिया है। ये वर्ग देसी शराब का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। अब इनके हाथ में बाहर से कोई पैसा तो आ नहीं रहा है। अनाज बेचेंगे, सरकारी पैसा निकालेंगे और मधुशाला की तरफ दौड़ पड़ेंगे। औरतों के खातों में भी पैसा आया है। जोर जबरदस्ती करके वो पैसा भी ले लेंगे। औरत रोकेगी (और जरूर रोकेगी) क्योंकि उसे बच्चों की चिंता है, घर की चिंता है। शराबी को बस शराब की चिंता है। वो उसे डाँटेगा, मारेगा। घरेलू हिंसा चरम पर जा सकती है। भूखमरी के शिकार हो जायेंगे कितने लोग। गाँव में आये दिन बवाल भी होगा। इसमें किसी का दोष नहीं है। दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं- तमाशा करवाने वाले, करने वाले और देखने वाले।
सबकी अपनी करनी है, सबके अपने दाम।
कितनी  आँखें  फूटेंगी जब  छलकेंगे जाम।

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