Friday, 24 April 2020

आभासी दुनिया में भावशून्य होता हमारा समाज

"भाई साहेब हम इंसान इतने भावशून्य क्यों होते जा रहे हैं?"
  एक मित्र ने जब ये सवाल किया तो मेरे मन में हजारों विचार पनपने लगें। मैं सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ हमारे साथ जो हम इतने निष्ठुर होते जा रहे हैं। बड़ी से बड़ी घटना, दुर्घटना, पीड़ा को नज़रअंदाज़ करके जीना कैसे सीख लिया हमने। उसका उत्तर मेरी समझ से बाहर था। इसलिए मैंने तुरंत जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन ये प्रश्न मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है। गाहे बगाहे दिमाग़ में गूँजता रह रहा है। फिर मैंने बारीकी से सोचने की कोशिश की। कुछ चीजें समझ में आयी। इसके लिए मैंने कोई शोध अथवा खोजबीन नहीं की। बस मुझको जो महसूस हुआ, वही आपसे साझा कर रहा हूँ।
   पहले संयुक्त परिवार हुआ करता था। महंगाई इतनी ज्यादा नहीं थी या यों कहें जरूरतें सीमित थीं। सर ढ़कने के लिए एक मिट्टी का घर, पेट भरने के लिए जो जून की रोटी, पहनने के लिए दो जोड़ी कपड़े। संसाधनों का आविष्कार इतनी मात्रा में नहीं था और उसकी पहुँच इतनी सुलभ भी नहीं थी;दूसरे हमारी महत्वाकांक्षा भी इतनी प्रबल नहीं थी। लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय था। परिवार के लोग एकसाथ खेत में काम करते, एकसाथ भोजन करते और एकसाथ आराम करते। पहले घर बहुत बड़े भी नहीं होते थे, सब के अपने अलग कमरे नहीं होतें थे, लोग एकदूसरे के बगल चारपाई डाल के सोते थे। जब लोग इतने करीब होंगे तो ज़ाहिर सी बात है कि एकदूसरे के सुखदुख से वाकिफ भी होंगे और शामिल भी होंगे। शाम को गाँव में बैठकी हुआ करती थी। सबके हालचाल, हँसी मज़ाक़ और रहन सहन से हर कोई वाकिफ़ हुआ करता था। ऐसे में लोगों की संवेदना एकदूसरे से जुड़ी हुई थी। शादी विवाह, जन्म मरण, हँसी खुशी के समारोह गाँव के हर सदस्य की भागीदारी हुआ  करती थी। किसी के घर से चारपाई, कहीं से बिस्तर, कहीं से राशन, सब साथ मिलकर व्यवस्था करते और साथ मिलकर ही जश्न भी मनाते। ऐसे में हर आदमी दूसरे आदमी से जुड़ा हुआ महसूस करता और उसके दुख दर्द में पीड़ा भी महसूस करता। अब परिवार टूट गये। संसाधन बढ़ गए, मंहगाई बढ़ गई, जरूरत बढ़ गई और महत्वाकांक्षा तो आसमान छूने लगी। लोग एकदूसरे से दूर होने लगे। पलायन होने लगा। शिक्षा, रोजगार और सुख की तलाश में सब अलग अलग भटकने लगे। और जब दूरी बढ़ती तो स्वाभाविक सी बात है संवेदना घट जाती है।अब दुर्घटना होती है तो ये किसी के लिए समाचार का स्रोत है, किसी के शोध का विषय है, किसी के एजेंडे में फिट करने लायक है, किसी के मनोरंजन है।जब हम खुद को उससे जुड़े हुए महसूस ही नहीं कर पाते तो उसके लिए भाव कैसे रख सकते हैं। वैसे एक सत्य यह भी है कि घृणित आदमी बुरी ख़बर का इंतज़ार करता है, वही उसके असतित्व का साधन है।
  रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल और कम्प्यूटर का आविष्कार हुआ। सबकुछ बहुत आसान हो गया। पहले रिश्तेदारों का हालचाल लेने लोग तीन तीन दिन पैदल चलकर जाते थे। जिसके यहाँ जाते थे वो पूरा घर सर पर उठा लेता था। आवभगत सीमित साधनों में पूरे भाव से किया जाता था। मेहमान और मेज़बान दोनों आभारी हो जाते थे। विदा करते समय दोनों के आँखों में आँसू भी होता था। इसके दो कारण थे एक तो पता नहीं कब अगली मुलाकात हो और दूसरा कि अगली बार मुलाकात हो कि न हो।आज के दौर में कहीं पहुँचना आसान हो चुका है। सड़कें बन गईं हैं, गाड़ियों की कमी नहीं है लेकिन अब कोई जल्दी किसी के यहाँ जाता नहीं।अब अपने घर किसी को बुलाने के लिए या तो मरना पड़ता है या फिर शादी करनी पड़ती है। क्योंकि हालचाल, सुखदुख और बातचीत सब मोबाइल, कम्प्यूटर के माध्यम से हो ही जाती है। मतलब पहले हम फिज़िकली कनेक्टेड थे, अब वर्चुअली। जब हम आमने सामने होतें हैं तो नौटंकी नहीं कर पाते, हमारे भाव असली होतें हैं और अगर नकली हुए भी तो सामने वाले की समझ में आ जातें हैं। लेकिन फोन पर नकली हँसना, रोना, झूठ बोलकर मूर्ख बनाना सब संभव है। आभासी दुनिया में मरने का विडियो देखकर आभासी पीड़ा, दुर्घटना देखकर आभासी दुख...सबकुछ झूठ और नकली। पहले तो कुछ फर्क भी पड़ता था लेकिन आए दिन वही चीज देखते देखते आदत पड़ गई है। किसी ने किसी को मार दिया, कहीं भीड़ हत्या हो गई, कहीं बालात्कार हो गया, कहीं प्राकृतिक आपदा आ गई। सबके फोटो और विडियो न्यूज़ चैनल से लेकर सोशलमीडिया तक फैलने लगते हैं। विडियो देखे, कमेंट की किए, भगवान उनकी आत्मा को शांति दें वाला पोस्ट किये, लम्बा लेख पढ़े, कुछ जुड़ने की कोशिश कर ही रहे थे कि महिला पुरुष, दलित, हिन्दू मुस्लिम वाला फैक्टर निकल कर आ गया। अब क्या?जहाँ दुख होना चाहिए था वहाँ घृणा, आरोप प्रत्यारोप और दंगा फसाद होने लगा। पूरा मुद्दा मुड़कर कहीं और चला गया। और हम धीरे धीरे खतरनाक होते गए। बिना भाव के, बिना पीड़ा के एकदम हिंसक पशुओं की तरह। हमारे समाज में रोने को मूर्खता समझा जाने लगा है, सीधा  होने का मतलब बुद्धिहीन। बुद्धि के प्रकोप ने हँसने को,मारने को लड़ने को तो प्रासंगिक रहने दिया लेकिन रोने को, बचाने को और बर्दाश्त करने को कायरता की श्रेणी में डाल दिया।



~अभिषेक सिंह

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