Thursday, 9 April 2020

लॉकडाउन और गरीबी

नेटफ्लिक्स पर एक फिल्म है "The Platform".एक स्टेशन है..हर फ्लोर पर दो आदमी..कब किसका फ्लोर बदल जाये कुछ पता नहीं।स्टेशन पर सबके खाने का इंतज़ाम किया जाता है। लेकिन दिक्कत ये है कि खाना सारे फ्लोर से होकर गुजरता है। लोग अपनी आवश्यकता से ज्यादा खाते और बर्बाद करते हैं। जिसकी वजह से बहुत सारे फ्लोर पर खाना पहुँच ही नहीं पाता। वो भूखे रहते हैं। भूख से तड़पते हैं। अब दो भूखे लोगों में जो ज्यादा ताकतवर होता है वो दूसरे को मार देता है। उस आदमी के मांस से अपने पेट की आग बुझाता है। एकतरफ ये अमानवीय नज़ारा होता है जो हैरान कर देता है दूसरी तरफ ये कि जिन लोगों तक पर्याप्त भोजन पहुँच रहा होता है अगर वो लोग केवल अपने हिस्से का खाते तो स्टेशन पर किसी को भूखा नहीं रहना पड़ता।
  अब बात करते हैं आज के परिपेक्ष्य में..एक तरफ वो लोग हैं जो सम्पन्न हैं, जिनकी पहुँच है, जिनके लिए कुछ भी सम्भव है। दूसरी तरफ वो लोग जो उपेक्षित, नंगे, भूखे, गरीब हैं। सक्षम लोगों का घर भरा पड़ा है, वो खुद खा रहे हैं, गरीबों को खिला रहे हैं, फोटो खिंचा रहे हैं। उनके लिए सबकुछ ठीक चल रहा है। वंचित लोग पैसे की कमी से जूझ रहे हैं, जो जून की रोटी के लिए तिकड़म कर रहे हैं। गलती कर रहे हैं, गालियाँ सुन रहे हैं। बच्चों का पेट भर जाये इसलिए बाप भूखा सो रहा है, गली के कुत्ते भूखे मर रहे हैं। ये स्थिति ज्यादा दिन तक रही तो ये भी नौबत आ सकती है कि कोई किसी को मारकर अपना पेट भरे। वह समाज की नज़र में दानव होगा, दुनिया कोसेगी उसे। लेकिन आज तमाम चीजों से अपना घर भरते वक़्त क्या आपको तनिक भी ख़्याल आ रहा होगा कि कोई खाली हाथ लौट गया होगा दुकान से, कीमत बढ़ रही है, सबके बस की बात नहीं है कि वो खरीद सके अपनी जरूरत भर की ही वस्तुएँ..!! मनुष्य का स्वभाव है संहार...नकाबों में ये स्वभाव छिप जाता है मगर नकाब उतरा तो कई लोग उतर जायेंगे बहुत नीचे फिर देते रहियेगा दुहाई मानवता की..!!

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