Sunday, 26 January 2020

गणतंत्र दिवस

"गणतंत्र दिवस के आलोक में"
 भारत अपना ७१वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार है कि संविधान की दुहाई देकर और संविधान की आड़ में ही देश कई हिस्सों में बँटा हुआ है। संविधान की शपथ लेने वालों, संविधान की रक्षा करने वालों और संविधान के अनुसार चलने वालों के बीच एक गहरी खाईं पनप रही है। ये कहना मुश्किल है कि कौन संवैधानिक बात कर रहा है और कौन संविधान का ग़लत फ़ायदा उठा रहा है। केंद्र सरकार ने संविधान का सहारा लेकर नागरिकता संसोधन कानून बनाया, कई राज्य सरकारें संविधान के अनुच्छेद १३१ के तहत उच्चतम न्यायालय की शरण में गईं और कुछ लोग इस कानून को संविधान के अनुच्छेद १४ का हनन मानते हुए, इसका विरोध कर रहे हैं। अब ये सारे लोगों की गाड़ी संविधान के सहारे ही चल रही है। लेकिन क्या यह संभव है कि एक ही मुद्दे पर सभी लोग संविधान के अनुसार सही भी हों और सभी में मतभेद भी हो। दर'असल इसका जवाब तो केवल उच्चतम न्यायालय ही दे सकती है। तमाम याचिकाओं के आलोक में उच्चतम न्यायालय ने फ़िलहाल हिंसा और गतिरोध के चलते तुरंत सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। यहाँ एक चीज़ और ध्यान देने योग्य है कि सरकार का धर्म है, जनता के हितों की रक्षा करते हुए, देश का विकास करना लेकिन सरकार ने जनता को विश्वास में लिए बिना ही संसद से ये कानून पारित कर दिया और जनता का काम है कि संविधान के अनुसार अपने अधिकारों को प्राप्त करना लेकिन वही जनता उच्चतम न्यायालय के फैसले का इंतज़ार करने की बजाय खुद निर्णय ले ली कि कानून संवैधानिक नहीं है और सड़कों पर उतर आई। मतलब यह साफ़ है कि सब अपने कर्तव्य से विमुख हैं।

  ऐसे मौकों पर राजनीतिक दलों की भूमिका बढ़ जाती है। उन्हें आपसी बातचीत और सहयोग के माध्यम से जनता को समझाना चाहिए। लेकिन अभी ऐसा होता नहीं दिख रहा है। सबको अपना-अपना हित साधना है। मामले को सुलझाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है क्योंकि मामले को सुलगाने में ही सबका फ़ायदा है। इसमें बस नुकसान है तो देश की अस्मिता और एकता को। संविधान सभा में कोई भी प्रस्ताव बहुमत से नहीं बल्कि एकमत से पारित होता था। सभी प्रस्तावों के लिए सभी सदस्यों का राज़ी होना जरूरी होता था। संविधान सभा में विभिन्न मत, समुदाय, धर्म, जाति, समुदाय के लोग थे। उनमें वैचारिक एवं सामाजिक मतभेद भी होता था। लेकिन देशहित में, सभी देशवासियों के हित में सभी लोग एकसाथ, एकमत हो जाते थे। आज जितनी भी राजनैतिक पार्टियाँ इनके नामों पर अपनी गाड़ी चला रहीं हैं, उन्हें इनके आदर्शों से इतना तो सीखना ही चाहिए कि कभी-कभी देशहित में स्वयं के हित को किनारे रखकर सुलह की पहल करनी चाहिए। आज की स्थिति को देखते हुए ऐसा होना संभव नहीं लग रहा है। भारतीय राजनीति का नैतिक पतन अपने चरमोत्कर्ष पर है।

    दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसा होना चिंतनीय है। सरकार को जनता के हितों की रक्षा करनी चाहिए और जनता को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यही एक परिपक्व लोकतंत्र की विशेषता है। अपने राजनैतिक और व्यक्तिगत हितों के लिए राष्ट्रीय मूल्यों की अनदेखी करना कतई उचित नहीं है। आज देश के झंडे को फहराने वालों और संविधान की कसम खाने वालों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है। गणतंत्र दिवस पर अपने संविधान के लिए हमें इतना तो करना ही चाहिए।

             "  जय हिंद "

~अभिषेक सिंह

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