भारत विविधताओं से भरा देश है।हलांकि विविधताएँ केवल अकेले भारत के हिस्से में नहीं आयीं।दुनिया के ज्यादातर बड़े देशों में यह आसानी से मिल जाती है।लेकिन उनमें से बहुत सारे देशों ने बहुसंख्यकों के हिसाब से अपने को ढ़ाल लिया।भारत ने विविधता का सम्मान किया और सभी के लिए समान व्यहार करने की संकल्पना की। यही कारण था कि ज्यादातर पश्चिमी विद्वानों ने भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की उम्र बहुत कम बताई थी।क्योंकि यह उस समय के हिसाब से बहुत ज्यादा आदर्श और ढेर सारी मान्यताओं को तोड़ने वाला लोकतंत्र बन गया था।गाँधी ने नेहरू पर भरोसा जताया और नेहरू इसपर लगभग खरे उतरे। उन्होंने सभी को स्वीकारा, सभी को अधिकार देने की वकालत की और सभी के प्रतिनिधित्व का सम्मान किया। यही विविधता और यही पहचान भारत के लिए समय-समय पर चुनौती बनती रही है। शुरुआत के कुछ सालों तक आज़ादी का नशा था तो वामपंथी और समाजवादी विचारधाराओं की गरीब, अमीर, अगड़ों, पिछड़ो, ऊँच, नीच वाली थ्योरी को लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उस समय धर्म से ज्यादा प्राथमिकता सबको बराबर-बराबर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दर्जा देने की बात को दी गई। कांग्रेस सत्ता में थी और लगभग सभी विपक्षी दल इन्हीं बातों पर उसे घेरते थे। हलांकि यह एक राजनैतिक एजेंडा था इसलिए आंशिक परिवर्तन तो आया मगर इन सबके बीच की खाई और गहराती चली गई। मेरा मानना है कि सबको बराबरी देने का मापदंड गलत था, जिस प्रकार से बराबरी देने की बात की जा रही। दर'असल वह बिल्कुल गलत दिशा थी। आप जब किसी का अवसर, किसी का संसाधन, किसी की मेरिट को छीन कर किसी और को न्याय देने की बात करेंगे तो असंतोष के साथ-साथ दुर्भावना भी फैलेगी। यही वज़ह है कि भारत में जाति वैमनष्यता लगातार बढ़ती जा रही है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। सरकारों को इसके उन्मूलन को बढ़ावा देना चाहिए था लेकिन राजनीतिक फ़ायदा उठाने के लिए ये गलतियां लगातार सभी दल कर रहे हैं। सभी को समानता देने की बात करना बहुत बड़ी चुनौती है और सभी क्षेत्रों में देने की सोचना लगभग मूर्खता।हलांकि भारत ने लगातार इस दिशा में काम किया है परन्तु नेताओं की इच्छाशक्ति में कमी और मौकापरस्ती की वज़ह से यह सम्भव नहीं हो सका है।अस्सी के दशक में वोट बैंक की राजनीति शुरू हुई और साम्प्रदायिक ताकतों को मजबूती मिली। देश के सामने अपनी पंथनिरपेक्षता को बचाना बहुत बड़ी चुनौती हो गई।
जैसे-जैसे साम्प्रदायिकता को बल मिला देश गाँधी की विचारधारा से दूर होता गया।पहले के आंदोलनों में गाँधी मॉडल अपनाया जाता था जो लम्बा लेकिन पूर्णतः अहिंसक हुआ करता था।बाद में देशवासियों का असंतोष बढ़ता गया। सरकारों के वादाखिलाफी, बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण लोगों के अंदर निराशा के साथ-साथ आक्रोश भी बढ़ता गया। राज्य जब अपना धर्म अच्छे से नहीं निभा पाता तो जनता के अराजक होने के चांसेस बढ़ जाते हैं। अब विरोध का स्वरूप बदल गया है। लोगों के अंदर एक जल्दबाज़ी बरपी रहती है। इंतज़ार करना बेवकूफी कही जाती है। इसके पीछे एक तो आधुनिक जीवनशैली जिम्मेदार है, दूसरे अब लोगों को हुक्मरानों पर इतना भरोसा भी नहीं है कि वे शांति से कही गई बात को आसानी से मान जायेंगे। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। हमेशा से इतिहास इसे दोहरता रहा है। जर्मनी, रूस, इरान, चीन जैसे देश इसके सटीक उदाहरण हैं। उदारीकरण और भूमंडलीकरण से लोगों की उम्मीद बढ़ी थी। पूरी दुनिया में तेजी से विकास हुए। तकनीक ने ऊँचाइयाँ छूईं। तमाम देश एकसाथ मिलकर आगे बढ़ने लगे। लेकिन अब, इतने सालों के बात लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस चीन को यूरोप और अमेरिका के पैसे मिले, वही अब उनके सर पर चढ़ रहा है। ऐसे ही विकसित देशों ने विकासशील देशों के साथ किया। शहरों ने गाँवों के साथ किया। गरीब और गरीब होता गया,अमीर और अमीर होता गया। कुछ नहीं बदला, बस खिलाड़ी बदल गए, खेल बदल गया, परिणाम वही रहा। जैसे-जैसे ये हालात बढ़ते जायेंगे। लोगों का सब्र टूटता जायेगा। सड़कों पर हथियारों के साथ उतरती हुई भीड़ को काबू करना बहुत बड़ी चुनौती बन जायेगी। हिंसा अब परिवर्तन के लिए जरूरी बताई जायेगी। हिटलरों की संख्या बढ़ती जायेगी। युद्धों का इतिहास पढ़ने वाली पीढ़ियों को अब अपना इतिहास बनाने का शौक चढ़ा है। अब हर 2 अक्टूबर को गोडसे टॉप पर ट्रेंड करता रहेगा।
~अभिषेक सिंह
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