Saturday, 20 July 2019

अलविदा शीला दीक्षित

दिल्ली पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली,  देश की राजनीति में एक सफल एवं सशक्त महिला राजनीतिज्ञ के रूप में छाप छोड़ने वाली, शीला दीक्षित का 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।एक महिला का पुरुष प्रधान भारतीय राजनीति में इस मुकाम पर पहुंचना और उसे बखूबी निभाना हमेशा याद किया जाएगा।शीला दीक्षित का जाना भारतीय राजनीति की एक अपूरणीय क्षति तो है ही साथ ही साथ राजीव गांधी से लेकर राहुल गांधी तक के साथ हमेशा मजबूती से खड़ी रहने वाली एक विश्वसनीय चेहरे का सूनापन गांधी परिवार को भी बहुत अखरेगा। एक ऐसे समय जब कांग्रेस संकट में है और राहुल गांधी अध्यक्ष पद से हर हाल में हटना चाह रहे हैं तो कांग्रेस परिवार को एकजुट एवं एकसाथ रखने वालों में से एक शीला दीक्षित का चले जाना कितना नुकसानदायक होगा यह तो आने वाला भविष्य ही बताएगा।
 शीला दीक्षित की राजनीतिक पारी पारी की शुरुआत 1984 में हुई जब राजीव गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में लिया। राजनीति में आना उनके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि उनके पति विनोद दीक्षित के पिता उमाशंकर दीक्षित कांग्रेश के पुराने सिपाही थे एवं इंदिरा गांधी सरकार में गृहमंत्री मंत्री भी रह चुके थे।सन 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में शीला दीक्षित कन्नौज से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बनीं।राजीव गांधी सरकार में वह संसदीय कार्य राज्यमंत्री रहीं एवं संयुक्त राष्ट्र आयोग में महिलाओं की स्थिति पर भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।सन 1998 में सोनिया गांधी ने उन्हें दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया, उसी दौरान दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में, कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज की अगुवाई वाली भाजपा को मात दे दी और शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री बनाया गया।अपने कार्यकाल में उन्होंने कुछ सराहनीय कार्य किए हैं, जिसके लिए दिल्ली की जनता को उनका स्मरण होता रहेगा दिल्ली में मेट्रो लाना कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन अवैध कब्जे हटाकर ट्रेन की पटरी आना कॉलेज की लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन बांटना सीएनजी लाना उनके ऐसे काम है जिनका जनता पर सीधे तौर पर पड़ा शीला दीक्षित 15 सालों तक 15 साल 1998 से 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री बनी रही इस दौरान उनकी उपलब्धियों के साथ साथ उन पर आरोप भी लगे जो राजनीति में कोई नई बात नहीं है 2013 में हुए निर्भया कांड कामनवेल्थ गेम्स में घोटाले का आरोप अन्ना हजारे के आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल समूह का कांग्रेस पर घोटाले के आरोप दिल्ली की जनता का एकरूपता से उठ जाना एवं 15 सालों तक राज करने के बाद आत्मविश्वास अति आत्मविश्वास होने के कारण 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी एवं शीला दीक्षित दोनों को हार का सामना करना पड़ा।उसके बाद शीलाजी को कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया,परंतु उन्होंने कुछ महीने बाद ही इस्तीफा दे दिया।2017 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित को पहले तो मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया गया परंतु बाद में हटा दिया गया।फिर दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया,परंतु 2019 के आम चुनाव में पूर्वी दिल्ली से उन्हें भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा।जिसके बाद दिल्ली कांग्रेस के नेताओं में गुटबाजी होने लगी थी।अभी  एक हफ्ते पहले ही दिल्ली कांग्रेस प्रभारी पीसी चीको और शीला दीक्षित के बीच विवाद गहराया था,जब पीसी चीको ने शीला दीक्षित की खराब तबीयत का हवाला देते हुए उन्हें आराम करने की नसीहत दे डाली थी।और इसके जवाब में शीला दीक्षित ने चीको द्वारा बनाए गए कार्यकारी अध्यक्षों के अधिकार कम कर दिए थे। जिससे दिल्ली कांग्रेस में गुटबाजी हो गई थी।
 राजनीति में जो व्यक्ति 35 वर्ष की लंबी पारी खेला हो,और देश की राजधानी में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री के पद पर रहा हो,उस पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तो स्वाभाविक ही हैं परंतु शीला दीक्षित जैसी सशक्त महिला राजनेत्री भारतीय आवाम के दिलों में हमेशा उपस्थित रहेंगी।आज समाज जब स्त्रियों के प्रतिनिधित्व एवं उनके प्रशासन कुशलता की तह में जाने का प्रयास कर रहा है तब शीला दीक्षित जैसी महिला हमेशा मिसाल के तौर पर पेश की जाएंगी।एक राजनीतिक शक्सियत होने के बाद भी सबसे मृदुभाषी एवं मिलनसार रवैया अपनाने की कला भारतीय राजनीति के नए नेताओं को इनसे सीखने की जरूरत है।मनुष्य की शरीर नश्वर एवं कर्म अमर हैं। आपका शरीर पार्थिव हो गया है परन्तु आपके योगदान अमर रहेंगे।
   ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें!

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